Pratidin Ek Kavita - podcast cover

Pratidin Ek Kavita

Nayi Dhara Radionayidhara.in
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Episodes

Raat Kisi Ka Ghar Nahi | Rajesh Joshi

रात किसी का घर नहीं | राजेश जोशी रात गए सड़कों पर अक्सर एक न एक आदमी ऐसा ज़रूर मिल जाता है जो अपने घर का रास्ता भूल गया होता है कभी-कभी कोई ऐसा भी होता है जो घर का रास्ता तो जानता है पर अपने घर जाना नहीं चाहता एक बूढ़ा मुझे अक्सर रास्ते में मिल जाता है कहता है कि उसके लड़कों ने उसे घर से निकाल दिया है। कि उसने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। लड़कों के बारे में बताते हुए वह अक्सर रुआँसा हो जाता है और अपनी फटी हुई क़मीज़ को उघाड़कर मार के निशान दिखाने लगता है कहता है उसने बचपन में भी अपने बच्चों...

Aug 17, 20254 minEp. 869

Chipe Raho Bheetar Hi | Nilesh Raghuvanshi

छिपे रहो भीतर ही | नीलेश रघुवंशी फर्स्ट अप्रैल, शनिवार, 2000, आधी रात कुछ-कुछ हो रहा है मुझे, शायद तुम अब आने वाले हो सारी दुनिया के बच्चे, सबके सो जाने के बाद ही, क्यों सोचते हैं आने के बारे में मेरे एकदम पास, तुम्हारे पापा सोए हुए हैं क्या उन्हें जगाकर बता देना चाहिए कि तुम आने वाले हो बहुत गहरी नींद में हैं वो-अभी उनमें एक नन्हा-मुन्ना दिख रहा है परी नन्ही-सी या नन्हा-सा राजकुमार, फिर वही बात पूरे नौ महीने एक ही बात, तुम हो कौन सुंदर रहस्य दर्द बढ़ता जा रहा है, समझ नहीं आ रहा कुछ तुम्हारे जन्...

Aug 16, 20253 minEp. 868

Dincharya | Shrikant Verma

दिनचर्या | श्रीकांत वर्मा एक अदृश्य टाइपराइटर पर साफ़, सुथरे काग़ज़-सा चढ़ता हुआ दिन, तेज़ी से छपते मकान, घर, मनुष्य और पूँछ हिला गली से बाहर आता कोई कुत्ता। एक टाइपराइटर पृथ्वी पर रोज़-रोज़ छापता है दिल्ली, बंबई, कलकत्ता। कहीं पर एक पेड़ अकस्मात छप करता है सारा दिन स्याही में न घुलने का तप। कहीं पर एक स्त्री अकस्मात उभर करती है प्रार्थना हे ईश्वर! हे ईश्वर! ढले मत उमर। बस के अड्डे पर एक चाय की दुकान दिन-भर बुदबुदाती है ‘टूटी हुई बेंच पर बैठा है उल्लू का पट्ठा पहलवान।’ जलाशय पर अचानक छप जाता है ...

Aug 15, 20252 minEp. 867

Badka Bhaiyya | Rupam Mishra

बड़का भइया | रूपम मिश्र बड़का भइया मेरी मझिगवां वाली दीदी के चचेरे भाई हैं उनकी पीढ़ी में सबसे बड़े और पट्टीदारी में सबसे मातिवर दीदी की हर सुंदर बात में बड़का भइया होते हैं जैसे कोई व्यक्ति सुंदर है तो वो ज़रूर बड़का भइया की तरह भभकता है संसार की सारी सौंदर्य उपमायें बड़का भइया के निहोरे पर बनी थी जैसे बड़का भइया का रंग कैसा है एकदम गोर-अंगार और आँखें आम की फांक दुनिया की जितनी आदर्श और श्रेठता की कहानियां थी बड़का भइया से जुड़ती थीं कोई प्राइमरी पढ़कर कलेक्टर हुआ तो वो ज़रूर बड़का भइया की प्रजाति का होगा ऐस...

Aug 14, 20253 minEp. 866

Pyaas | Ramdarash Mishra

प्यास | रामदरश मिश्र खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासा जल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँ मैने पूछा- "तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है नदी?” नदी दर्द से मुस्कराई, बोली "मैंने क्या किया है आदमी यह तो तुम्हारी ही गंदगी है। जो मुझमें झर-झर कर मुझे विषाक्त कर रही है अब तो मैं भी अपना जल नहीं पी पाती प्यासी-प्यासी बह रही हूँ ।"

Aug 13, 20252 minEp. 865

Daro | Ghanshyam Kumar Devansh

डरो | घनश्याम कुमार देवांश डरो लेकिन ईश्वर से नहीं एक हारे हुए मनुष्य से सूर्य से नहीं आकाश की नदी में पड़े मृत चंद्रमा से भारी व वज्र कठोर शब्दों से नहीं उनसे जो कोमल हैं और रात के तीसरे पहर धीमी आवाज़ में गाए जाते हैं डरो धार और नोक से नहीं एक नरम घास के मैदान की विशालता और हरियाली से साम्राज्य के विराट ललाट से नहीं एक वृद्ध की नम निष्कंप आँखों से

Aug 12, 20252 minEp. 864

Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj

जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुज बारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरे भीगते हुए निकली शवयात्रा बारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोग जो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कम सबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव पर दोस्त चल रहा था आगे-आगे निरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चाल शमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आग कई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थे नहीं बुझेगी चिता हम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चिता लौटने में तितर-बितर हुए लोग दोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैं मुझ...

Aug 11, 20253 minEp. 863

Itvaar | Anup Sethi

इतवार | अनूप सेठी आओ इतवार मनाएँ देर से उठें चाय पिएँ और चाय पिएँ अख़बार को सिर्फ़ उलट पलट लें हाथ न लगाएं सिर्फ़ चाय का गिलास घुमाएँ किसी को न बुलाएँ नहाना भी छोड़ दें खाना अकेले खाएँ बाजार खरीदारी स्थगित कर दें अगले हफ्ते तक केरोसिन ले लें दस रुपए ज़्यादा देकर एक पुरसुकून दोपहर हो ढीलमढाल पसरे रहें पुरानी एलबम निकालें पहली सालगिरह याद करें बातें करें बचपन की, कालेज की, नाटक की कविताई की सारे सपनों की धूल झाड़ें बिस्तर के इर्द गिर्द बिछा लें इतवार की शाम आँखों में आँखें डाल सो जाएँ एक इतवार तो हो अ...

Aug 10, 20252 minEp. 862

Jitne Sabhya Hotey Hain | Vinod Kumar Shukla

जितने सभ्य होते हैं | विनोद कुमार शुक्ल जितने सभ्य होते हैं उतने अस्वाभाविक। आदिवासी जो स्वाभाविक हैं उन्हें हमारी तरह सभ्य होना है हमारी तरह अस्वाभाविक । जंगल का चंद्रमा असभ्य चंद्रमा है इस बार पूर्णिमा के उजाले में आदिवासी खुले में इकट्ठे होने से डरे हुए हैं और पेड़ों के अंधेरे में दुबके विलाप कर रहे हैं क्योंकि एक हत्यारा शहर बिजली की रोशनी से जगमगाता हुआ सभ्यता के मंच पर बसा हुआ है ।...

Aug 09, 20252 minEp. 861

Gumshuda Guldaste | Adnan Kafeel Darwesh

गुमशुदा गुलदस्ते | अदनान कफ़ील दरवेश कुछ पेड़ हैं वहाँ पानी की तरह ठोस और हवा की तरह नर्म और आसमान-से हल्के-गुलाबी फूल उनमें खिलते काँटों-से बेशुमार दहकते शोलों-से दूर से चमकते... कच्चे रास्ते इशारों-से नाज़ुक झुके चले आते मेरी तरफ़ जहाँ तुम्हारी यादों के गुमशुदा गुलदस्ते ढूँढ़ते हैं मेरे पाँव... इन तुर्श अँधेरों में अपनी खोई उम्र को सोचता भटकता हूँ जहाँ बर्फ़ से भी तेज़ गल जाती हैं यादें.....

Aug 08, 20252 minEp. 860

Pratham Milan | Adnan Kafeel Darwesh

प्रथम मिलन | अदनान कफ़ील दरवेश एक दिन भाषा की चमकीली चप्पल उतार कर आऊँगा तुम से मिलने अपने प्रथम मिलन में मैं अधिक बोलने से परहेज़ करूँगा और अपनी आत्मा का हर बोझ उतार कर तुमसे मिलना चाहूँगा तुम्हारे मन के साँकल को हल्के-हल्के खटखटाउँगा तुम्हारी देह भाषा को पढ़ने के बजाए सुनना ज़्यादा पसंद करूँगा तुम भी वक़्त लेकर आना मुझसे मिलने एक सदी की गूँज हूँ मैं अपने एकांत में मुझे बूझने का भरपूर अवसर देना तुम मैं तुम से धीरे-धीरे मिलूँगा तुम्हारी हथेली से तुम्हारी आँखों तक का सफ़र तय करने में मैं एक सदी लगा देन...

Aug 07, 20252 minEp. 859

Tumhare Baare Mein | Bhawani Prasad Mishra

तुम्हारे बारे में | भवानी प्रसाद मिश्र तुम्हारे बारे में, तुमसे ही कहूँ तुम्हें देखकर बढ़ जाती है मशालों की ज्योति मोती हो जाता है ज़्यादा पानी दार आभार-सा मानता हैं हर प्रकाश का पुंज कुंज ज़्यादा हरे हो जाते हैं नदी-नद ज़्यादा भरे हो जाते हैं वन हो पाते हैं उन्मन पवन उतना चंचल नहीं रहता सृष्टि का श्रम जिस दिन मेरे हाथ में आयेगा मैं हर जगह तुम्हें पेश कर दूँगा सारे अविशेषों को स्पर्श से तुम्हारे सरासर सविशेष कर दूँगा !...

Aug 06, 20252 minEp. 858

Swapn Me Bhi Swapn Ke Bahar | Adnan Kafeel Darwesh

स्वप्न में भी स्वप्न के बाहर | अदनान कफ़ील दरवेश सोचो तो घर भी एक गुल्लक है। जिसमें बजते हैं तरल-ठोस दिन खड़-खड़ उदास... कागज़ हैं दीवारें जिन्हें सोख लिया है ढेर सारे समय का बजता पानी अहाते में हैं इमली और अमरूद के चमकदार दरख़्त दो बुज़ुर्गों की तरह खड़े शायद बच्चे हों बुत बने किसी बरहम हुए खेल के बीच रेहल पर धरा है कलाम-पाक हरे ग़िलाफ़ में बन्द रोककर समय की धार दीवार घड़ी मुँह फेरे टँगी है अलमारी के थोड़ा-सा ऊपर एक रहस्यमयी ख़ुशबू का झोंका हवा के साथ उड़ता हुआ पास से गुज़र जाता है रौशनदान से झरती ह...

Aug 05, 20252 minEp. 857

Samaj Unhe Mardana Kehta Hai | Ekta Verma

समाज उन्हें मर्दाना कहता है | एकता वर्मा जो राजाओं के युद्ध से लौटने का इन्तिज़ार नहीं करती उनके पीछे जौहर नहीं करती बल्कि निकलती हैं संतान को पीठ पर बाँध कर तलवार खींच कर रणभूमि में समाज उन्हें मर्दाना कहता है जो थाली में छोड़ी गई जूठन से संतोष नहीं धरती जो अपनी हथेलियों से दरेर कर तोड़ देती हैं भूख के जबड़े जो खाती हैं घर के मर्दों से देवढी ख़ुराक और पीती हैं लोटा भर पानी समाज उन्हें मर्दाना कहता है जिनके व्यक्तित्व में स्त्रीयोचित व्यवहार की बड़ी कमी होती है जिनकी चाल में सिखाई गई सौम्यता नहीं है स...

Aug 04, 20253 minEp. 856

Churchgate Ka Platform | Anup Sethi

चर्चगेट का प्लेट्फॉर्म | अनूप सेठी शाम के समय जब प्लेटफॉर्म बहुत व्यस्त होता है ढलती धूप के चौकोर टुकड़े पैरों से खचाखच भरते जाते हैं रीत जाते हैं फिर भर जाते हैं दीवारों पर लगे बड़े पँखों की हवा में साँस लेने पसीना सुखाने किसी का इंतज़ार करने को रुक जाते हैं कई लोग दो-दो मिनट में लोगों का रेला आता है दनदनाता धकियाता छूता आसपास गुजर जाता है जैसे टयूब वैल का बंबा छूटता है रुक रुक कर कलकल करता सिहराता जज़्ब हो जाता है खेतों की मिट्टी के रग रेशे में बहुत सारे पैरों को प्लेटफॉर्म की रोशनी के हवाले कर ...

Aug 03, 20252 minEp. 855

Deh | Devi Prasad Mishra

देह | देवी प्रसाद मिश्र देह प्रेम के काम आती है। वह यातना देने और सहने के काम आती है। पीटने में जला देने में आत्मा को तबाह करने के लिये कई बार राज्य और धर्म देह को अधीन बनाते हैं बाज़ार भी करता है यह काम वह देह को इतना सजावटी बना देता है कि उसे सामान बना देता है बहुत दुःख की तुलना में बहुत सुख से ख़त्म होती है आत्मा

Aug 02, 20252 minEp. 854

Ilahabad | Satyam Tiwari | Satyam Tiwari

इलाहबाद | सत्यम तिवारी तय तो यही हुआ था घोर असहमति के साथ जब भी वर्षा होगी हम यात्रा पर निकलेंगे असबाब उतना ही रहेगा जितना एक नाव पर सिमट आए भटकाव की सहूलत मिलेगी और निरपराध की भावना फिर भी कैसे तुमने मेरे रेतीले अस्तित्व को पग पग पर भास्काया जैसे रेत से घर नहीं बन सकता जैसे हम चाहते भी तो उसमें रह नहीं पाते तब से लेकर अब तक न जाने कितनी बरसातें बीतीं इलाहबाद डूबता रहा आकंठ और सिर्फ़ नूह का जहाज़ बचता रहा दुबारा तुम्हें मैंने कोसने के क्रम में ढूँढा तुम्हें नहीं पाता तो किसके आगे पटकता थाली हाथ नह...

Aug 01, 20252 minEp. 853

Todna Aur Banana | Priyadarshan

तोड़ना और बनाना | प्रियदर्शन बनाने में कुछ जाता है नष्ट करने में नहीं बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है तोड़ने में बस थोड़ी सी ताकत और थोड़े से मंसूबे लगते हैं। इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं, उससे कहीं ज़्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं। कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ, खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है। लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहरा आपने ध्यान से देखा है? वह...

Jul 31, 20254 minEp. 852

Prashn | Kunwar Narayan

प्रश्न | कुँवार नारायण तारों की अंध गलियों में गूँजता हुआ उद्दंड उपहास... वह मेरा प्रश्न है विशाल आडंबर, अभी चुभती दृष्टि की गर्म खोज में मैंने प्रश्नाहत जिस विराट हिमपुरुष को गलते हुए देखा... क्या वह तेरा उत्तर था?

Jul 30, 20251 minEp. 851

Mom Ka Ghoda | Dushyant Kumar

मोम का घोड़ा | दुष्यंत कुमार मैने यह मोम का घोड़ा, बड़े जतन से जोड़ा, रक्त की बूँदों से पालकर सपनों में ढालकर बड़ा किया, फिर इसमें प्यास और स्पंदन गायन और क्रंदन सब कुछ भर दिया, औ’ जब विश्वास हो गया पूरा अपने सृजन पर, तब इसे लाकर आँगन में खड़ा किया! माँ ने देखा—बिगड़ीं; बाबूजी गरम हुए; किंतु समय गुज़रा... फिर नरम हुए। सोचा होगा—लड़का है, ऐसे ही स्वाँग रचा करता है। मुझे भरोसा था मेरा है, मेरे काम आएगा। बिगड़ी बनाएगा। किंतु यह घोड़ा कायर था थोड़ा, लोगों को देखकर बिदका, चौंका, मैंने बड़ी मुश्किल से ...

Jul 29, 20252 minEp. 850

Ant Mein | Sarveshwar Dayal Saxena

अन्त में | सर्वेश्वरदयाल सक्सेना अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता, सुनना चाहता हूँ एक समर्थ सच्ची आवाज़ यदि कहीं हो। अन्यथा इसके पूर्व कि मेरा हर कथन हर मंथन हर अभिव्यक्ति शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए, उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ जो मृत्यु है। ‘वह बिना कहे मर गया’ यह अधिक गौरवशाली है यह कहे जाने से— ‘कि वह मरने के पहले कुछ कह रहा था जिसे किसी ने सुना नहीं।’...

Jul 28, 20252 minEp. 849

Dhoomil Ki Antim Kavita | Dhoomil

धूमिल की अंतिम कविता | धूमिल शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना कि यह लोहे की आवाज़ है या मिट्टी में गिरे हुए ख़ून का रंग लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो जिसके मुँह में लगाम है।

Jul 27, 20252 minEp. 848

Jaane Kis Kiska Khayal Aaya Hai | Dushyant Kumar

जाने किस-किसका ख़्याल आया है | दुष्यंत कुमार जाने किस—किसका ख़्याल आया है इस समंदर में उबाल आया है एक बच्चा था हवा का झोंका साफ़ पानी को खंगाल आया है एक ढेला तो वहीं अटका था एक तू और उछाल आया है कल तो निकला था बहुत सज-धज के आज लौटा तो निढाल आया है ये नज़र है कि कोई मौसम है ये सबा है कि बवाल आया है इस अँधेरे में दिया रखना था तू उजाले में बाल आया है हमने सोचा था जवाब आएगा एक बेहूदा सवाल आया है...

Jul 26, 20252 minEp. 847

Shahadat | Sunil Jha

शहादत | सुनील झा फूल, रास्ते भीड़ नज़ारे सारे तुम्हारे लिए और, तुम हो कि चुप हो... न सलाम न दुआ ऐसे भी कोई घर आता है भला!

Jul 25, 20252 minEp. 846

Amarta | Devi Prasad Mishra

अमरता | देवी प्रसाद मिश्र बहुत हुआ तो मैं बीस साल बाद मर जाऊँगा मेरी कविताएँ कितने साल बाद मरेंगी कहा नहीं जा सकता हो सकता है वे मेरे मरने के पहले ही मर जाएँ और तानाशाहों के नाम इसलिए अमर रहें कि उन्होंने नियन्त्रण के कितने ही तरीके ईज़ाद किए मैंने भी कुछ उपाय खोजे मसलन यह कि आदमी तक पहुँचने का टिकट किस खड़की से लिया जाए एक भुला दिया गया कवि बहुत याद किए जाते शासक से बेहतर होता है और अमरता की अनन्तता एक जीवन से बड़ी नहीं होती...

Jul 24, 20252 minEp. 845

Vasantsena | Shrikant Verma

वसंतसेना | श्रीकांत वर्मा सीढ़ियाँ चढ़ रही है वसंतसेना अभी तुम न समझोगी वसंतसेना अभी तुम युवा हो सीढ़ियाँ समाप्त नहीं होती उन्नति की हों अथवा अवनति की आगमन की हों या प्रस्थान की अथवा अवसान की अथवा अभिमान की अभी तुम न समझोगी वसंतसेना न सीढ़ियाँ चढ़ना आसान है न सीढ़ियाँ उतरना जिन सीढ़ियों पर चढ़ते हैं, हम, उन्हीं सीढ़ियों से उतरते हैं, हम निर्लिप्त हैं सीढ़ियाँ, कौन चढ़ रहा है कौन उतर रहा है चढ़ता उतर रहा या उतरता चढ़ रहा है कितनी चढ़ चुके कितनी उतरना है सीढ़ियाँ न गिनती हैं न सुनती हैं वसंतसेना।...

Jul 23, 20252 minEp. 844

Din Ghatenge | Dinesh Singh

दिन घटेंगे | दिनेश सिंह जनम के सिरजे हुए दुख उम्र बन-बनकर कटेंगे ज़िन्दगी के दिन घटेंगे कुआँ अन्धा बिना पानी घूमती यादें पुरानी प्यास का होना वसन्ती तितलियों से छेड़खानी झरे फूलों से पहाड़े -- गन्ध के कब तक रटेंगे ? ज़िन्दगी के दिन घटेंगे चढ़ गए सारे नसेड़ी वक़्त की मीनार टेढ़ी 'गिर रही है -- गिर रही है' -- हवाओं ने तान छेड़ी मचेगी भगदड़ कि कितने स्वप्न लाशों से पटेंगे ? ज़िन्दगी के दिन घटेंगे परिन्दे फिर भी चमन में खेत-बागों में कि वन में चहचहाएँगे नदी बहती रहेगी उसी धुन में चप्पुओं के स्वर लहर...

Jul 22, 20252 minEp. 843

Akalmandi Aur Moorkhta | Shubha

अकलमंदी और मूर्खता | शुभा स्त्रियों की मूर्खता को पहचानते हुए पुरुषों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है इस बात को उलटी तरह भी कहा जा सकता है पुरुषों की मूर्खताओं को पहचानते हुए स्त्रियों की अक्लमंदी को भी पहचाना जा सकता है वैसे इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि स्त्रियों में भी मूर्खताएँ होती हैं और पुरुषों में भी सच तो ये है कि मूर्खों में अक्लमंद और अक्लमन्दों में मूर्ख छिपे रहते हैं मनुष्यता ऐसी ही होती है फिर भी अगर स्त्रियों की अक्लमंदी पहचाननी है तो पुरुषों की मूर्खताओं पर कैमरा फ़ोकस करना ...

Jul 21, 20252 minEp. 842

Bhool Bhulaiyya | Shraddha Upadhyay

भूल-भूलैया | श्रद्धा उपाध्याय हम सबसे पहले मिलेंगे दिल्ली में घुमते बेमक़सद क़दमों में सड़कें तुम्हें घर ले जाएँगी और मुझे भूल-भूलैया में मैं किताबें खरीदूँगी कोई उन्हें पढ़ेगा मैं अपना कॉफ़ी मग अपने घर के नजदीकी पार्क में रोप दूँगी फिर कुछ दिन मैं उस बाग़ में रहूंगी जब वापस आऊँगी तो सोफ़े पर समेट लूँगी तीन कविताएँ पाँच कहानियाँ और साथ में मैं दो बार प्रेम में पडूँगी और छः बार निकस जाऊँगी ख़ून की जाँच करवाउँगी की एड़ियों की कठोरता का सबब मिले रसोई में जाऊँगी और एड़ियों पर खड़े होकर आराम पका लूँगी मैंने अपन...

Jul 20, 20252 minEp. 841

Main Gaane Lagta | Dinesh Singh

मैं गाने लगता | दिनेश सिंह अक्सर क्या होता मुझको जो मन ही मन शर्माने लगता तुम रोती, मैं गाने लगता तुम घर मैं कितना खटती हो कितने हिस्सों में बटती हो कड़ी धूप-सी सबकी बातें आर्द्र भूमि-सी तुम फटती हो मेरा मन छल-छल कर आँखों-आँखों से बतियाने लगता तुम रोती मैं गाने लगता चूल्हा-चौका रोटी-पानी सुबह-शाम की राम-कहानी दिन भर बच्चों की चिकचिक से पोछा करती हो पेशानी दस्तरखान सजाने वाले हाथों को सहलाने लगता तुम रोती मैं गाने लगता तुम पर सास-ससुर का हक़ है यह कहने में बड़ी खनक है चुप हूँ मैं जानते हुए भी यह ...

Jul 19, 20252 minEp. 840
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