उसकी गृहस्थी | राजेश जोशी थकी हारी लौटी है वो आफिस से अभी टिफिन बाक्स को रसोई में रखती है। मुँह पर पानी के छीटे मारती है बाहर निकल आई लट को वापस खोंसती है। बालों में आँखों को हौले से दबाती है हथेलियों से उठती है और रसोईघर की ओर जाने को होती है। मैं कहता हूँ, 'बैठो, तुम, आज मैं चाय बनाता हूँ ! मेरी आवाज़ की नोक मुझ़ी को चुभती है। गैस जला कर चाय का पानी चढ़ाता हूँ और दूसरे ही पल आवाज़ लगाता हूँ सुनो शक्कर किस डब्बे में रखी है और चाय की पत्ती कहाँ है ? साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती हुई वो आती है। म...
Jul 18, 2025•3 min•Ep. 839
तुम्हारी कविता | आभा बोधिसत्त्व तुम्हारी कविता से जानती हूँ तुम्हारे बारे में तुम सोचते क्या हो , कैसा बदलाव चाहते हो किस बात से होते हो आहत; किस बात से खुश तुम्हारा कोई बायोडटा नहीं मेरे पास फिर भी जानती हूँ मैं तुम्हें तुम्हारी कविताओं से क्या यह बडी़ बात नही कि नहीं जानती तुम्हारा देश , तुम्हारी भाषा तुम्हारे लोग मैं कुछ भी नहीं जानती, फिर भी कितना कुछ जानती हूँ तुम्हारे बारे में तुम्हारे घर के पास एक जंगल है उस में एक झाड़ी है अजीब जिस में लगता है एक चाँद-फल रोज़ जिसके नीचे रोती है विधवाएँ रा...
Jul 17, 2025•2 min•Ep. 838
कलिंग - श्रीकांत वर्मा केवल अशोक लौट रहा है और सब कलिंग का पता पूछ रहे हैं केवल अशोक सिर झुकाए हुए है और सब विजेता की तरह चल रहे हैं केवल अशोक के कानों में चीख़ गूँज रही है और सब हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं केवल अशोक लड़ रहा था ।
Jul 16, 2025•2 min•Ep. 837
अलगनी | शहंशाह आलम अलगनी पर मैंने क्या चीज़ सुखाई कविता की वो गीली किताबें जिसे बारिश ने पढ़ा था पूरे मन से जो बारिश मेघालय में होती होगी वही बारिश हुई इस दफ़ा मेरे पटना में अलगनी पर मैंने और क्या चीज़ सुखाई कविता की किताबों के अलावा अपने कपड़े… नहीं न अपने जूते… नहीं न अपने मोजे… नहीं न अपना पूरा घर सुखाया धूप के निकलने पर और अपनी देह को भी टाँगकर रखा अलगनी पर अब जब बारिश के बाद ठंड आएगी दस्तक देगी अलगनी ही मेरे दरवाज़े पर।...
Jul 15, 2025•2 min•Ep. 836
कहाँ रहेगी वह संताप के साथ?/ गगन गिल अगर वह उसके सीने पर रख दे अपना सिर या उसके कंधे पर अगर वह छुए उसका हाथ अक्तूबर की झुरझुरी में थाम ले उसकी बाँह घबराकर स्टेशन की हड़बड़ी में लौटते हुए रख दे चुपचाप उसकी गर्म गर्दन पर अलविदा का एक अधूरा, रुआँसा चुम्बन तो उस लम्बी-चौड़ी देह में क्या इतनी जगह होगी जहाँ वह रह सके अपने सारे संताप के साथ?...
Jul 14, 2025•2 min•Ep. 835
जब हम मारे जाएंगे | अरविन्द श्रीवास्तव जब हम बुन रहे होंगे कोई हसीन ख्वाब तुम्हारे बिल्कुल करीब आकर बाँट रहे होंगे आत्मीयता प्रेम व नग्न भाषा रच रहे होंगे कविताएँ तभी एक साथ उठ खड़े होंगे दुनिया के तमाम तानाशाह जिनके फरमान पर हत्यारे असलहों में भर लेंगे बारुद और खोजी कुत्ते सूंघ-सूंघ कर इस धरा को खोज निकालेंगे हमें हम किसी कोमल और मुलायम स्वप्न देखने के जुर्म में मारे जाएंगे जब हम मारे जाएंगे तब शायद हमारे लिए सबसे अधिक रोएगा वह बच्चा जो हमारे खतों को पहुँचाने के एवज में टॉफी पाता था।...
Jul 13, 2025•2 min•Ep. 834
मरघट | रघुवीर सहाय शानदार मौत थी इसलिए कि कोई न भीड़ थी न था रोना-धोना हम लोग एक बड़े ख़ाली खेत में गए गाँव के सिमटने से बचा रह गया था जो और एक हल्की-सी देह को फेंक आए “कहाँ है मरघट?” जो पता दिया गया था पूछता उसे चला रामजस स्कूल के पीछे एक जगह दो लड़के बोले, “हाँ, रामजस? वहीं हम पढ़ते हैं—मरघट वहीं पर है?” —मुँह बाकर रह गया वह युवक— यह तो पता ही न था! फिर हम भटक गए अंत में एक किसी से मिले दोनों ने सुखमय आश्चर्य से पूछा— ''मरघट? मरघट? मैं वहीं जा रहा हूँ, चलिए'' यों रस्ता मिल गया। दाह-संस्कार में ...
Jul 12, 2025•4 min•Ep. 833
या देवि! | वीरेन डंगवाल माथे पर एक आँख लम्बवत उसके भी ऊपर मुकुट बहुत सारे हाथ मगर दीखते दो ही : एक में टपकता मुंड। दुसरे में टपटपाता खड्ग। शेर नीचे खड़ा है। दांत दिखाता, मगर सीधा - सादा। बगल में नदी बह रही लहरदार। पहाड़ क्या हैं, रामलीला का पर्दा हैं। माता, मैं उस चित्रकार को प्रणाम करता हूँ जिस ने तेरी यह धजा बनाई।
Jul 11, 2025•2 min•Ep. 832
बहनें | आभा बोधिसत्त्व बहनें होती हैं, अनबुझ पहेली-सी जिन्हें समझना या सुलझाना इतना आसान नही होता जितना लटों की तरह उलझी हुई दुनिया को , इन्हें समझते और सुलझाते ...में विदा करने का दिन आ जाता है न जाने कब इन्हें समझ लिया जाता अगर वो होती ... कोई बन्द तिजोरी... जिन्हे छुपा कर रखते भाई या कोई... देखते सिर्फ़... या ...कि होती ... सांझ का दिया ... जिनके बिना ... न होती कहीं रोशनी... पर नही़ बहनें तो पानी होती हैं बहती हैं... इस घर से उस घर प्यास बुझातीं जी जुड़ातीं...किस-किस का किस-किस के साथ विदा ह...
Jul 10, 2025•2 min•Ep. 831
अंतिम आलाप | प्राची कितना और समेटूँ ख़ुद को! ख़ुद की सूनी-वंचित बाँहों में धूप का छुआ मेरा रंग कपड़ों के इस पार तक ही है तुम्हारे छूने की लालसा अंतस को कचोटती अँधेरे में सकुचाती और सर्वस्व त्याग देने को खड़ी— ध्यान-मुद्रा में पेड़ो-पहाड़ो-जानवरो-बच्चो, कोई तो मेरी देह अपने तक खींच लो, ख़ुद के भार से मैं धँसती जा रही हूँ अंतिम आलाप का आख़िरी सुर जहाँ न पहुँचे वहीं कहीं छुपी बैठी हूँ।...
Jul 09, 2025•2 min•Ep. 830
पुरी का समुद्र | ज्ञानेन्द्रपति आँखों में पुरी का समुद्र लिये जब लौटोगी विस्मय -विस्फारित अपनी बड़री आँखों में तरंग-विकल वह संयम-असमर्थ समुद्र पछाड़ खाता, पुकारता, लीलने को आता उद्द्वेलित, उद्दाम, हहाता दष्टि-छोर तक फेला, फूला, फेनिल टूट-टूट बिखर, तुम्हारे पैरों तले बिछ जाता तुम्हें छोड़ जाता हुआ कुछ-कुछ गीला, कुछ-कुछ भीत तुम्हारे कन्धों पर रख हाथ, तुम्हारी आँखों में झाँकता मैं जानूँगा, अरे! यह तो मेरे मन का प्रतिबिम्ब है।...
Jul 08, 2025•2 min•Ep. 829
आऊँगा | लीलाधर जगूड़ी नए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा ज्यों ही तुम मेरे शब्दों के पास आओगे मैं तुम्हारे पास आऊँगा जैसे बादल पहाड़ की चोटी के पास आता है। और लिपट जाता है जिसे वे ही देख पाते हैं जिनकी गर्दनें उठी हुई हों। मैं वहाँ तुम्हारे दिमाग़ में जहाँ एक मरुस्थल है। आना चाहता हूँ मैं आऊँगा। मगर उस तरह नहीं बर्बर लोग जैसे कि पास आते हैं उस तरह भी नहीं गोली जैसे कि निशाने पर लगती है मैं आऊँगा। आऊँगा तो उस तरह जैसे कि हारे हुए, थके हुए में दम आता है।...
Jul 07, 2025•3 min•Ep. 828
मन के पन्ने | नासिरा शर्मा जब तुम थककर सोते हो तो तुम्हारे उजले तलवों को देख कर जाने क्यों ख़याल आता है उसपर लिख दूँ मन के इंद्रधनुष से एक प्रेम-पत्र जिसमें लिखा हो अवाम का वह प्यार जो हम उनसे करते हैं जिस में हो उनके आहत मन की भूखी-प्यासी इच्छाओं के दस्तावेज़ और हमारी नाकाम कोशिशों के न थकने वाले हौसले तुम जहाँ-जहाँ जाओ छप जाए धरती के सीने पर यह शब्द सपने, सपने और सपने हमारी उम्मीदों के जिसपर चल सकें वह सब जो करते हैं प्रेम जो लिख सकते हैं प्रेम पत्र दूसरों की व्यथाओं के मेरे अक्षर और तुम्हारे ...
Jul 06, 2025•2 min•Ep. 827
भवसागर | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी में बोना है अमर बीज इसी में पाना है खोना है प्यार भवसागर है यह संतों का इसी में ढूंढ़ना है निकलने का द्वार
Jul 05, 2025•1 min•Ep. 826
नष्ट कुछ भी नहीं होता | प्रियदर्शन नष्ट कुछ भी नहीं होता, धूल का एक कण भी नहीं, जल की एक बूंद भी नहीं बस सब बदल लेते हैं रूप उम्र की भारी चट्टान के नीचे प्रेम बचा रहता है थोड़ा सा पानी बनकर और अनुभव के खारे समंदर में घृणा बची रहती है राख की तरह गुस्सा तरह-तरह के चेहरे ओढ़ता है, बात-बात पर चला आता है, दुख अतल में छुपा रहता है, बहुत छेड़ने से नहीं, हल्के से छू लेने से बाहर आता है, याद बादल बनकर आती है जिसमें तैरता है बीते हुए समय का इंद्रधनुष डर अंधेरा बनकर आता है जिसमें टहलती हैं हमारी गोपन इच्छा...
Jul 04, 2025•2 min•Ep. 825
प्रार्थना | रचित ईश्वर, ध्यान देना… जब खड़ा होना पड़े मुझे तो अपने अस्तित्व से ज़्यादा जगह न घेरूँ। मैं ऋग्वेद के चरवाहों की करुणा के साथ कहता हूँ— मुझे इस अनंत ब्रह्मांड में मेरे पेट से बड़ा खेत मत देना, हल के भार से अधिक शक्ति, बैल के आनंद से अधिक श्रम मत देना। मैं तोलस्तोय के किसान से सीख लेकर कहता हूँ : मुझे मत देना उतनी ज़मीन जो मेरे रोज़ाना के इस्तेमाल से ज़्यादा हो, हद से हद एक चारपाई जितनी जगह जिसके पास में एक मेज़-कुर्सी आ जाए। मुझे मेरे ज्ञान से ज़्यादा शब्द, सत्य से ज़्यादा तर्क मत देना। सब...
Jul 03, 2025•2 min•Ep. 824
अंगूठे | अरविन्द श्रीवास्तव बताओ, कहाँ मारना है ठप्पा कहाँ लगाने हैं निशान तुम्हारे सफ़ेद—धवल काग़ज़ पर हम उगेंगे बिल्कुल अंडाकार या कोई अद्भुत कलाकृति बनकर बगैर किसी कालिख़, स्याही और पैड के अंगूठे गंदे हैं मिट्ती में सने हैं आग में पके हैं पसीने की स्याही में ।
Jul 02, 2025•1 min•Ep. 823
कोई सागर नहीं | भवानीप्रसाद मिश्र कोई सागर नहीं है अकेलापन न वन है एक मन है अकेलापन जिसे समझा जा सकता है आर-पार जाया जा सकता है जिसके दिन में सौ बार कोई सागर नहीं है न वन है बल्कि एक मन है हमारा तुम्हारा सबका अकेलापन!
Jul 01, 2025•2 min•Ep. 822
वापसी | अहमद फ़राज़ उस ने कहा सुन अहद निभाने की ख़ातिर मत आना अहद निभाने वाले अक्सर मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं तुम जाओ और दरिया दरिया प्यास बुझाओ जिन आँखों में डूबो जिस दिल में उतरो मेरी तलब आवाज़ न देगी लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ इतनी तेज़ और इतनी ऊँची हो जाए जब दिल रो दे तब लौट आना अहद: प्रतिज्ञा/ वादा महजूरी: विरह...
Jun 30, 2025•2 min•Ep. 821
प्रेम का अर्थशास्त्र | विहाग वैभव जितना हो तुम्हारे पास उससे कम ही बताना सबसे ख़र्च करते हुए हमेशा थोड़ा-सा बचा लेना माँ की गुप्त पूँजी की तरह जब छाती पर समय का साँप लोटने लगेगा हर साँस में चलने लगेगी जून की लू और तुम्हें लगेगा कि मन का आईना रेगिस्तान की गर्म हवाओं से चिटक रहा है तब कठिन वक़्तों में काम आएगा वही थोड़ा-सा बचा हुआ प्रेम।
Jun 29, 2025•2 min•Ep. 820
मछली बोली कवि से | के. सच्चिदानंदन अनुवाद : गिरधर राठी उपमा मुझे मत दो स्त्री की आँख की स्त्री हूँ मैं स्वयं, पूरी, संपूर्ण मुझे नहीं धरना है भेष जलपरियों का मैं नहीं ढोऊँगी नारी का भारी सिर मुझसे अँगूठी निगलवा कर करा नहीं पाओगे मछुए का इंतज़ार मैं नहीं कोई अवतार जो लाए वेद को उबार। वापस पहुँचा दो मुझे जल में तुम कच्चा ही, तड़पना पड़े न मुझे रेत में बनकर प्रतीक या फिर कोई रूपक।...
Jun 28, 2025•2 min•Ep. 819
आना | कैलाश मनहर आऊँगा बारिश से भीगे खेतों पर क्वार की धूप बनकर चमकता-सा.... आऊँगा थके हुए बदन की रगों में धारोष्ण दूध की तरह उफनता-सा.... आऊँगा रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में मानभरी लालिमा लिए दमकता-सा.... आऊँगा अकेले बच्चे के पास नाचती हुई चिड़िया के परों में लचकता-सा.... आऊँगा मकई के दानों में बनकर मिठास, शरद के आसपास सूर्योदय के साथ चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ ज़रूर ज़रूर आऊँगा, करना तुम -- इन्तज़ार.......
Jun 27, 2025•2 min•Ep. 818
राग भटियाली | कुँवर नारायण एक राग है भटियाली बाउल संगीत से जुड़ा हुआ अंतिम स्वर को खुला छोड़ दिया जाता है वायुमंडल में लहराता हुआ जैसे संपूर्ण जीवन राग से युक्त हुई एक ध्वनि अनंत में विलीन हो गई... वह शेष स्वरों को बाँधता नहीं इसलिए अंत में भी उनसे बँधता नहीं, अंतिम आह जैसा कुछ एक अजीब तरह की मुक्ति का एहसास देता है वह...
Jun 26, 2025•1 min•Ep. 817
एक नन्हा-सा कीड़ा | ज्ञानेन्द्रपति यह एक नन्हा-सा कीड़ा अभी जिसको मसल जाता पैर जीवन की क्षणभंगुरता पर विचारने का एक लमहा एक ठिठका हुआ क्षण जिसको जल्दी से लाँघने में नहीं दिखता धरती की सिकुड़न में खोये हुए-से इस कीड़े में कितने भूकम्पों की स्मृति साँस लेती है। इतिहास के कितने युगों की स्मृति कि इसके लिए यह कल की ही बात जव वनमान्ष ने दोनों अगले पैर उठाए थे हाथों के आकार में मानव-सभ्यता ने लिये थे पाँव अकारण गंभीर और करुण होने के क्षण में नहीं दिखता कि यह कीड़ा हमें भी देख रहा है कि यह जो बचने की भ...
Jun 25, 2025•2 min•Ep. 816
भूख | नरेश सक्सेना भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है उसके बाद आँखें फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख वह रिश्तों को खाती है माँ का हो बहन या बच्चों का बच्चे तो उसे बेहद पसंद हैं जिन्हें वह सबसे पहले और बड़ी तेज़ी से खाती है बच्चों के बाद फिर बचता ही क्या है।
Jun 24, 2025•1 min•Ep. 815
तुम्हें डर है | गोरख पांडेय हज़ार साल पुराना है उनका ग़ुस्सा हज़ार साल पुरानी है उनकी नफ़रत मैं तो सिर्फ़ उनके बिखरे हुए शब्दों को लय और तुक के साथ लौटा रहा हूँ मगर तुम्हें डर है कि आग भड़का रहा हूँ।
Jun 23, 2025•1 min•Ep. 814
राहें | नरेंद्र शर्मा कुहरा छाया है गिरि-वन पर, गिरि-शिखरों पर; नहीं रहा आकाश आज आकाश, घिरे हैं बादल धौरे; मैं नीचे समतल पठार पर चला जा रहा— लेकिन ऊँचे तल की राहें धुँधग्रस्त हैं!
Jun 22, 2025•1 min•Ep. 813
दिन बौने हो गए | उमाकांत मालवीय रातें लम्बी हुईं दिन बौने हो गए । ठिगने कद वाले दिन लम्बी परछाइयाँ धूप की इकाई पर तिमिर की दहाइयाँ रातें पत्तल हुईं दिन दौने हो गए । कुहरों पर लिखी गई विष भरी कहानियाँ नीली पड़ने लगी सुबह की जवानियाँ रातें आँगन हुईं दिन कौने हो गए । बर्फ़ीले ओठों पर शब्द ठिठुरने लगे नाकाफ़ी ओढ़ने बिछौने जुड़ने लगे रातें अजगर हुईं दिन छौने हो गए ।...
Jun 21, 2025•2 min•Ep. 812
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Jun 20, 2025•1 min•Ep. 811
पुरानी हवेली | खगेंद्र ठाकुर इस हवेली से गाँव में आदी-गुड़ बंटे सोहर की धुन सुने बहुत दिन हो गए इस हवेली से सत्यनारायण का प्रसाद बंटे घड़ी-घंट की आवाज सुने बहुत दिन हो गए इस हवेली से किसी को कन्धा लगाए राम नाम सत है- सुने बहुत दिन हो गए इस हवेली की छत पर उग आई है बड़ी-बड़ी घास आम, पीपल आदि उग आये हैं पीढ़ियों की स्मृति झेलती जर्जर हवेली का सूनापन देख ये सब एकदम छत पर चढ़ गए हैं. इस हरियाली के बीच गिरगिटों, तिलचिट्टों के सिवा कोई नहीं है, कोई नहीं है।...
Jun 19, 2025•2 min•Ep. 810