दीवाना दिल - नासिरा शर्मा अक्सर सोचती हूँ मैं जब भी मैंने चलना चाहा तुम्हें लेकर अपने संग नहीं समझ पाए तुम वह राहें तुम्हारे खेतों से उगी गेंहूँ की बालियों से फूटे दानों को बोना चाहती थी अपने आँगन में ताकि बना सकूँ रिश्ता ज़मीन से ज़मीन का उसकी उगी कोंपलों के रस को पी सकूँ और महसूस कर सकूँ तुमसे गहरे जुड़ाव को भेजने को कहा था तुमसे मैनें भेज दो कुछ ख़ुशबूदार पौधे मुझे जिसे बोती मैं अपनी क्यारियों में और सूँघती तुम्हारे सीने की गंध को माना तुम भेजते हो फूल किसी फ्लावर शाप से जो सूख जाते हैं दो-चा...
Jun 18, 2025•3 min•Ep. 809
सम्बन्धों के ठंडे घर में | अमरनाथ श्रीवास्तव सम्बन्धों के ठंडे घर में वैसे तो सबकुछ है लेकिन इतने नीचे तापमान पर रक्तचाप बेहद खलता है| दिनचर्या कोरी दिनचर्या घटनायें कोरी घटनायें पढ़ा हुआ अखबार उठाकर हम कब तक बेबस दुहरायें नाम मात्र को सुबह हुई है कहने भर को दिन ढलता है| सहित ताप अनुकूलित घर में मौसम के प्रतिमान ढूंढते आधी उमर गुजर जाती है प्याले में तूफान ढूंढते गर्म खून वाला तेवर भी अब तो सिर्फ हाथ मलता है| सजे हुए दस्तरख्वानों पर मरी भूख के ताने -बाने ठहरे हुए समय सी टेबुल टिकी हुई बासी मुस्क...
Jun 17, 2025•2 min•Ep. 808
मृत्यु-गीत | लैंग्स्टन ह्यूज़ अनुवाद : धर्मवीर भारती मातम के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिए, मातम और मौत के नक़्क़ारे बजाओ मेरे लिए और भीड़ से कह दो कि मिल कर के मरसिया गाए ताकि उसकी आवाज़ में मेरी हिचकियाँ डूब जाएँ। मौत के नक़्क़ारों के साथ सिसकते हुए बेले की महीन और दुखी आवाज़— लेकिन सूरज के संगीत से परिपूर्ण शंख की एक हुँकार भरी आवाज़ भी हो, जो मेरे साथ जाए, उस अँधियारे मृत्युलोक में जहाँ मैं जा रहा हूँ।...
Jun 16, 2025•2 min•Ep. 807
मृत घोषित | अंकिता आनंद उसके आख़िरी दिनों में कभी टूथपेस्ट के ट्यूब को दो टुकड़ों में काटा हो, तो तुमने देखा होगा कितना कुछ बचा रह जाता है तब भी जब लगता है सब ख़त्म हो गया। ज़िंदगी का कितना बड़ा टुकड़ा अक्सर फ़ेंक दिया जाता है उसे मरा समझ।
Jun 15, 2025•2 min•Ep. 806
उन्होंने घर बनाये - अज्ञेय उन्होंने घर बनाये और आगे बढ़ गये जहाँ वे और घर बनाएँगे। हम ने वे घर बसाये और उन्हीं में जम गये : वहीं नस्ल बढ़ाएँगे और मर जाएँगे। इस से आगे कहानी किधर चलेगी? खँडहरों पर क्या वे झंडे फहराएँगे या कुदाल चलाएँगे, या मिट्टी पर हमीं प्रेत बन मँडराएँगे जब कि वे उस का गारा सान साँचों में नयी ईंटें जमाएँगे? एक बिन्दु तक कहानी हम बनाते हैं। जिस से आगे कहानी हमें बनाती है : उस बिन्दु की सही पहचान क्या हमें आती है?...
Jun 14, 2025•2 min•Ep. 805
धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत | अनुपम सिंह धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत उनके मुँह का स्वाद मेरा ही रंग देख बिगड़ता था वे मुझे अपने दरवाज़े से ऐसे पुकारते जैसे किसी अनहोनी को पुकार रहे हों उनके हज़ार मुहावरे मुँह चिढ़ाते थे काली करतूतें काली दाल काला दिल काले कारनामे बिल्लियों के बहाने दी गई गालियाँ सुन मैं ख़ुद को बिसूरती जाती थी और अकेले में छिपकर रोती थी पहली बार जब मेरे प्रेम की ख़बरें उड़ीं तो माँ ओरहन लेकर गई उन्होंने झिड़क दिया उसे कि मेरे बेटे को यही मिली है प्रेम करने...
Jun 13, 2025•4 min•Ep. 804
चुका भी हूँ मैं नहीं - शमशेर बहादुर सिंह चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी । जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर । किंतु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी । सरल से भी गूढ़, गूढ़तर तत्त्व निकलेंगे अमित विषमय जब मथेगा प्रेम सागर हृदय । निकटतम सबकी अपर शौर्यों की तुम तब बनोगी एक गहन मायामय प्राप्त सुख तुम बनोगी तब प्राप्य जय !...
Jun 12, 2025•2 min•Ep. 803
लड़की | अंजना वर्मा गर्मी की धूप में सुर्ख़ बौगेनवीलिया की एक उठी हुई टहनी की तरह वह पतली लड़की गर्म हवा झेलती साइकिल के पैडल मारती चली जा रही है वह जब भी निकलती है बाहर कालेज के लिए कई काम हो जाते हैं रास्ते में दवा की दुकान है और डाकघर भी काम निबटाते और वापस आते देर हो जाती है अक्सर सवेरे का गुलाबी सूरज हो जाता हे सफेद तब तक तपकर रोज़ ही करती है सामना लू का उसे अपना रास्ता मालूम है अब रास्ते में जो मिले छाँह की उम्मीद उसे नहीं रहती है धूप के लिए लड़की हमेशा तैयार रहती है...
Jun 11, 2025•2 min•Ep. 802
नई भूख | हेमंत देवलेकर भूख से तड़पते हुए भी आदमी रोटी नहीं मांगता वह चिल्लाता है 'गति...गति!! तेज़...और तेज़... इससे तेज़ क्यों नहीं' कभी न स्थगित होने वाली वासना है गति हमारे पास डाकिये की कोई स्मृति नहीं बची। दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते पहुँच रहा है सब कुछ सारी आधुनिकता इस वक़्त लगी है समय बचाने में - जो स्वयं ब्लैक होल है। हो सकता है किसी रोज़ हम बना लें समय भी मगर क्या तब भी होगा हमारे पास इतना समय भी कि किसी उल्टे पड़े छटपटाते कीड़े को सीधा कर सकें ।...
Jun 10, 2025•2 min•Ep. 801
तुम नहीं समझोगे | भवानीप्रसाद मिश्र तुम नहीं समझोगे केवल किया हुआ इसलिए अपने किए पर वाणी फेरता हूँ और लगता है मुझे उस पर लगभग पानी फेरता हूँ तब भी नहीं समझते तुम तो मैं उलझ जाता हूँ लगता है जैसे नाहक़ अरण्य में गाता हूँ और चुप हो जाता हूँ फिर लजाकर अपनी वाणी को इस तरह स्वर से सजा कर!
Jun 09, 2025•2 min•Ep. 800
दौड़ -कुमार अम्बुज मुझे नहीं पता मैं कब से एक दौड़ में शामिल हूँ विशाल अंतहीन भीड़ है जिसके साथ दौड़ रहा हूँ मैं गलियों में, सड़कों पर, घरों की छतों पर, तहखानों में तनी हुई रस्सी पर सब जगह दौड़ रहा हूँ मैं मेरे साथ दौड़ रही है एक भीड़ जहाँ कोई भी कम नहीं करना चाहता अपनी रफ्तार मुझे ठीक-ठीक नहीं मालुम मैं भीड़ के साथ दौड़ रहा हूँ या भीड़ मेरे साथ अकेला पीछे छूट जाने के भय से दौड़ रहा हूँ या आगे निकल जाने के उन्माद में मुझे नहीं पता मैं अपने पड़ौसी को परास्त करना चाहता हूँ या बचपन के किसी मित्र को...
Jun 08, 2025•4 min•Ep. 799
फूटा प्रभात | भारतभूषण अग्रवाल फूटा प्रभात, फूटा विहान वह चल रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्भर के स्वर झर-झर, झर-झर। प्राची का अरुणाभ क्षितिज, मानो अंबर की सरसी में फूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज। धीरे-धीरे, लो, फैल चली आलोक रेख घुल गया तिमिर, बह गई निशा; चहुँ ओर देख, धुल रही विभा, विमलाभ कांति। अब दिशा-दिशा सस्मित, विस्मित, खुल गए द्वार, हँस रही उषा। खुल गए द्वार, दृग खुले कंठ, खुल गए मुकुल शतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुँजार लिए खुल गए बंध, छवि के बंधन। जागो जगती के सुप्त बाल!...
Jun 07, 2025•3 min•Ep. 798
राजधानी | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इतना आतंक था मन पर कि चौथाई तो मर चुका था उतरने के पहले ही राजधानी के प्लेटफॉर्म पर मेरा महानगर प्रवेश नववधू के गृह प्रवेश की तरह था मगर साथियों के साथ दौड़ते, लड़खड़ाते और धक्के खाते सीख ही लिये मैंने भी सारे काट लँगड़ी और धोबिया- पाट एक से एक क़िस्से थे वहाँ परियों और विजेताओं आलिमों और शाइरों के प्याले टकराते हुए मैं भी बोलता था सिकंदर और ग़ालिब के अंदाज़ में हालाँकि प्याला ही भरता और दस्तरख़्वान ही बिछाता रहा शाही महफिलों में दिन बीतते रहे मेरी याददाश्त धुँधली हो...
Jun 06, 2025•3 min•Ep. 796
अमलताश / अंजना वर्मा (1) उठा लिया है भार इस भोले अमलताश ने दुनिया को रोशन करने का बिचारा दिन में भी जलाये बैठा है करोड़ों दीये! (2) न जाने किस स्त्री ने टाँग दिये अपने सोने के गहने अमलताश की टहनियों पर और उन्हें भूलकर चली गई (3) पीली तितलियों का घर है अमलताश या सोने का शहर है अमलताश दीवाली की रात है अमलताश या जादुई करामात है अमलताश!...
Jun 05, 2025•1 min•Ep. 797
पीहर का बिरवा / अमरनाथ श्रीवास्तव पीहर का बिरवा छतनार क्या हुआ, सोच रही लौटी ससुराल से बुआ । भाई-भाई फरीक पैरवी भतीजों की, मिलते हैं आस्तीन मोड़कर क़मीज़ों की झगड़े में है महुआ डाल का चुआ । किसी की भरी आँखें जीभ ज्यों कतरनी है, किसी के सधे तेवर हाथ में सुमिरनी है कैसा-कैसा अपना ख़ून है मुआ । खट्टी-मीठी यादें अधपके करौंदों की, हिस्से-बँटवारे में खो गए घरौंदों की बिच्छू-सा आँगन दालान ने छुआ । पुस्तैनी रामायण बँधी हुई बेठन में अम्मा जो जली हुई रस्सी है ऐंठन में बाबू पसरे जैसे हारकर जुआ । लीप रही है...
Jun 04, 2025•2 min•Ep. 795
दीवानों की हस्ती | भगवतीचरण वर्मा हम दीवानों की क्या हस्ती, हैं आज यहाँ, कल वहाँ चले, मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले। आए बनकर उल्लास अभी, आँसू बनकर बह चले अभी, सब कहते ही रह गए, अरे, तुम कैसे आए, कहाँ चले? किस ओर चले? यह मत पूछो, चलना है, बस इसलिए चले, जग से उसका कुछ लिए चले, जग को अपना कुछ दिए चले, दो बात कही, दो बात सुनी; कुछ हँसे और फिर कुछ रोए। छककर सुख-दु:ख के घूँटों को हम एक भाव से पिए चले। हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले, हम एक निसानी-सी उर पर, ले असफलता...
Jun 03, 2025•2 min•Ep. 794
साठ का होना | मदन कश्यप तीस साल अपने को सँभालने में और तीस साल दायित्वों को टालने में कटे इस तरह साठ का हुआ मैं आदमी के अलावा शायद ही कोई जिनावर इतना जीता होगा कद्दावर हाथी भी इतनी उम्र तक नहीं जी पाते कुत्ते तो बमुश्किल दस-बारह साल जीते होंगे बैल और घोड़े भी बहुत अधिक नहीं जीते उन्हें तो काम करते ही देखा है हल खींचते-खींचते जल्दी ही बूढ़े हो जाते हैं बैल और असवार के लगाम खींचने पर दो टाँगों पर खड़े हो जाने वाले गठीले घोड़े कुछ ही दिनों में खरगीदड़ होकर ताँगों में जुते दिखते हैं। मनुष्यों के दरवा...
Jun 02, 2025•4 min•Ep. 793
आत्मालोचन | त्रिलोचन शब्द, मालूम है, व्यर्थ नहीं जाते हैं पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए किंतु मेरे अंतरनिवासी ने मुझसे कहा— लिखा कर तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे एक साथ सत्य शिव सुंदर को दिखा जाए अब मैं लिखा करता हूँ अपने अंतर की अनुभूति बिना रंगे चुने काग़ज़ पर बस उतार देता हूँ।
Jun 01, 2025•2 min•Ep. 792
मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा | कैलाश मनहर मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा जब संसद में चल रही होगी बहस कि क्यों और कितना ज़रूरी है बचाना कानून को ? कविता से, होने वाले खतरे पर चिन्तित सत्ता और प्रतिपक्ष के सांसद कानून की मज़बूती के बारे में सोच रहे होंगे, वातानुकूलित सदन में बाहर की उमस और गर्मी से बेख़बर । मन्दिरों में गूँज रहे होंगे शंख और घड़ियाल मस्जिदों में अज़ानें कि शैतान अब कविता की शक़्ल में आया है चर्च में प्रार्थना कर रहे होंगे यीशु के हत्यारे.... ऐसा ही होगा शायद कि मैं कोई कविता लिख रहा हूँ...
May 31, 2025•2 min•Ep. 791
कहीं बारिश हो चुकी है | ज़ीशान साहिल मकान और लोग बहुत ख़ुश और नए नज़र आ रहे हैं रास्ते और दरख़्त ख़ुद को धुला हुआ महसूस कर रहे हैं दरख़्त: पेड़ फूल और परिंदे तेज़ धूप में फैले हुए हैं ख़्वाब और आवाज़ें शायद पानी में डूबे हुए हैं उदासी और ख़ुशी ओस की तरह बिछी है ऐसा लगता है मेरे दिल से बाहर या तुम्हारी आँखों के पास कहीं बारिश हो चुकी है...
May 30, 2025•2 min•Ep. 790
पाव भर कद्दू से बना लेती है रायता | ममता कालिया एक नदी की तरह सीख गई है घरेलू औरत दोनों हाथों में बर्तन थाम चौकें से बैठक तक लपकना जरा भी लड़खड़ाए बिना एक साँस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियाँ और घुस जाती है लोकल में धक्का मुक्की की परवाह किए बिना राशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगी रिक्शा न मिले तो दोनों हाथों में झोले लटका वह पहुँच जाती है अपने घर एक भी बार पसीना पोंछे बिना एक कटोरी दही से तीन कटोरी रायता बना लेती है खाँटी घरेलू औरत पाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती है ज़रा भी घबराए बिना!...
May 29, 2025•2 min•Ep. 789
ओ पृथ्वी तुम्हारा घर कहाँ है | केदारनाथ सिंह जीने के अथाह खनिजों से लदी और प्रजनन की अपार इच्छाओं से भरी हुई ओ पृथ्वी ओ किसी पहले आदमी की पहली गोल लिट्टी कहीं अपने ही भीतर के कंडे पर पकती हुई ओ अग्निगर्भा ओ भूख ओ प्यास ओ हल्दी ओ घास ओ एक रंगारंग भव्य नश्वरता जिसकी हर आवृत्ति में वही उदग्रता वही पहलापन ओ पृथ्वी ओ मेरी हमरक़्स तुम्हारा घर कहाँ है!...
May 28, 2025•2 min•Ep. 788
कविता में | अमिता प्रजापति कितना कुछ कह लेते हैं कविता में सोच लेते हैं कितना कुछ प्रतीकों के गुलदस्तों में सजा लेते हैं विचारों के फूल कविता को बाँध कर स्केटर्स की तरह बह लेते हैं हम अपने समय से आगे वे जो रह गए हैं समय से पीछे उनका हाथ थाम साथ हो लेती है कविता ज़िन्दगी जब बिखरती है माला के दानों-सी फ़र्श पर कविता हो जाती है काग़ज़ का टुकड़ा सम्भाल लेती है बिखरे दानों को दुख और उदासी को हटा देती है नींद की तरह ताज़े और ठंडे पानी की तरह हो जाती है कविता...
May 27, 2025•2 min•Ep. 787
अजनबी शाम | जौन एलिया धुँद छाई हुई है झीलों पर उड़ रहे हैं परिंद टीलों पर सब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़ बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़ अपने गल्लों को ले के चरवाहे सरहदी बस्तियों में जा पहुँचे दिल-ए-नाकाम मैं कहाँ जाऊँ अजनबी शाम मैं कहाँ जाऊँ नशेमनों: आश्रय रुख़: दिशा गल्लों: झुण्ड
May 26, 2025•2 min•Ep. 786
देर हो जाएगी | अशोक वाजपेयी देर हो जाएगी- बंद हो जाएगी समय से कुछ मिनिट पहले ही उम्मीद की खिड़की यह कहकर कि गाड़ी में अब कोई सीट ख़ाली नहीं। देर हो जाएगी कड़ी धूप और लू के थपेड़ों से राहत पाने के लिए किसी अनजानी परछी में जगह पाने में, एक प्राचीन कवि के पद्य में नहीं स्वप्न में उमगे रूपक को पकड़ने में, हरे वृक्ष की छाँह में प्यास से दम तोड़ती चिड़िया तक पानी ले जाने में देर हो जाएगी- घूरे पर पड़े सपनों स्मृतियों इतिहास के चिथड़ों को नवेरने पड़ोसी के आँगन में अकस्मात् गिर पड़ी बालगेंद को वापस लाने, ...
May 25, 2025•2 min•Ep. 785
सौ बातों की एक बात - रमानाथ अवस्थी सौ बातों की एक बात है. रोज़ सवेरे रवि आता है दुनिया को दिन दे जाता है लेकिन जब तम इसे निगलता होती जग में किसे विकलता सुख के साथी तो अनगिन हैं लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं सौ बातो की एक बात है. अनगिन फूल नित्य खिलते हैं हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं लेकिन जब ये मुरझाते हैं तब हम इन तक कब जाते हैं जब तक हममे साँस रहेगी तब तक दुनिया पास रहेगी सौ बातों की एक बात है. सुन्दरता पर सब मरते हैं किन्तु असुंदर से डरते हैं जग इन दोनों का उत्तर है जीवन इस सबके ऊपर है सबके जीवन म...
May 24, 2025•2 min•Ep. 784
आँच | वंदना मिश्रा गर्मियों में तेज़ आँच देखकर माँ कहती थी : 'आग अपने मायके आई है' और फिर चूल्हे की लकड़ियाँ कम कर दी जाती थीं मैं कहती थी : 'मायके में तो उसे अच्छे से रहने दो माँ कम क्यों कर रही हो?' माँ कहती थी : 'ये लड़की प्रश्न बहुत पूछती है।' बाद में समझ आया प्रश्न पूछने से मना करना आग कम करने की तरफ़ बढ़ा पहला क़दम होता है।...
May 23, 2025•1 min•Ep. 783
ज़ूमिंग |अशफ़ाक़ हुसैन देखूँ जो आसमाँ से तो इतनी बड़ी ज़मीं इतनी बड़ी ज़मीन पे छोटा सा एक शहर छोटे से एक शहर में सड़कों का एक जाल सड़कों के जाल में छुपी वीरान सी गली वीराँ गली के मोड़ पे तन्हा सा इक शजर तन्हा शजर के साए में छोटा सा इक मकान छोटे से इक मकान में कच्ची ज़मीं का सहन कच्ची ज़मीं के सहन में खिलता हुआ गुलाब खिलते हुए गुलाब में महका हुआ बदन महके हुए बदन में समुंदर सा एक दिल उस दिल की वुसअ'तों में कहीं खो गया हूँ मैं यूँ है कि इस ज़मीं से बड़ा हो गया हूँ मैं सहन: आँगन, शजर: पेड़, वृक्ष वुसअ'त...
May 22, 2025•2 min•Ep. 782
पगली आरज़ू | नासिरा शर्मा कहा था मैंने तुमसे उस गुलाबी जाड़े की शुरुआत में उड़ना चाहती हूँ मैं तुम्हारे साथ खुले आसमान में चिड़ियाँ उड़ती हैं जैसे अपने जोड़ों के संग नापतीं हैं आसमान की लम्बाई और चौड़ाई नज़ारा करती हैं धरती का, झांकती हैं घरों में पार करती हैं पहाड़, जंगल और नदियाँ फिर उतरती हैं ज़मीन पर, चुगती हैं दाना सुस्ताती किसी पेड़ की शाख़ पर अलापतीं हैं कोई गीत प्रेम का जब उमड़ता है प्यार तो गुदगुदाती हैं अपनी चोंच से एक दूसरे को उसी तरह मैं प्यार करना चाहती हूँ तुम्हें लब से लब मिला कर, ह...
May 21, 2025•3 min•Ep. 781
हँसो एक बच्चे की तरह | अमिता प्रजापति तुम प्यार को पृथ्वी मान कर मत घूमो हर्क्यूलिस की तरह मत झुकाओ इसके वज़न से अपनी गर्दन धीरे से सरका के इसे गिरा लो अपने पैरों में उछालो गेंद की तरह हँसो एक बच्चे की तरह...
May 20, 2025•1 min•Ep. 780