51. Rudra Samhita; Sati Khand - Adhyay 18 (श्री रुद्र संहिता; सती खण्ड -अठारहवाँ अध्याय)
"ब्रह्माजी से दक्ष की अनुमति पाकर देवताओं और मुनियों सहित भगवान् शिव का दक्ष के घर जाना, दक्ष द्वारा सबका सत्कार तथा सती और शिव का विवाह"

"ब्रह्माजी से दक्ष की अनुमति पाकर देवताओं और मुनियों सहित भगवान् शिव का दक्ष के घर जाना, दक्ष द्वारा सबका सत्कार तथा सती और शिव का विवाह"
"सती को शिव से वर की प्राप्ति तथा भगवान शिव का ब्रह्मा जी को दक्ष के पास भेजकर सती का वरण करना"
"ब्रह्मा जी का रुद्र देव से सती के साथ विवाह करने का अनुरोध, श्री विष्णु द्वारा अनुमोदन और श्री रुद्र की इसके लिये स्वीकृति"
"सती की तपस्या से संतुष्ट देवताओं का कैलास में जाकर भगवान् शिव का स्तवन करना"
"दक्ष की साठ कन्याओं का विवाह, दक्ष और वीरिणी के यहाँ देवी शिवा का अवतार, दक्ष द्वारा उनकी स्तुति तथा सती के सद्गुणों एवं चेष्टाओं से माता-पिता की प्रसन्नता"
"ब्रह्मा जी की आज्ञा से दक्ष द्वारा मैथुनी सृष्टि का आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों और शबलाश्वों को निवृत्ति मार्ग में भेजने के कारण दक्ष का नारद को शाप देना"
"दक्ष की तपस्या तथा देवी शिवा का उन्हें वरदान देना"
"संध्या की आत्महुति, उसका अरुंधति के रूप में अवतीर्ण होकर मुनिवर वशिष्ठ के साथ विवाह करना, ब्रह्मा जी का रुद्र के विवाह के लिए प्रयास और चिंता तथा भगवान विष्णु का उन्हें शिव की आराधना के लिए उपदेश देकर चिंतामुक्त करना"
"संध्या की तपस्या, उसके द्वारा भगवान शिव की स्तुति तथा उससे संतुष्ट हुए शिव का उसे अभीष्ट वर दे मेधातिथि के यज्ञ में भेजना"
"कामदेव के नमो का निर्देश, उसका रति के साथ विवाह तथा कुमारी संध्या का चरित्र - वशिष्ठ मुनि का चंद्रभाग पर्वत पर जाकर उसको तपस्या की विधि बताना"
"नारद जी के प्रश्न और ब्रह्मा जी के द्वार उनका उत्तर, सदाशिव से त्रिदेवों की उत्पत्ति तथा ब्रह्मा जी से देवता आदि के सृष्टि के पश्चात एक नारी और एक पुरुष का प्राकट्य"
भगवान शिव का कैलाश पर्वत पर गमन तथा सृष्टि खण्ड का उपसंहार"
"यज्ञदत्तकुमार को भगवान शिव की कृपा से कुबेर पद की प्राप्ति तथा उनकी भगवान शिव के साथ मैत्री"
"स्वIयंभू मनु और शतरूपा की, ऋषियों की तथा दक्षकन्याओं की संतानों का वर्णन तथा सती और शिव की महत्ता का प्रतिपादन"
"सृष्टि का वर्णन"
"विभिन्न पुष्पो, अन्नो, तथा जल आदि की धIराओं से शिव जी की पूजा का महात्म्य"
"शिव पूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन"
"भगवान शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन"
"शिव पूजन की विधि तथा फल प्राप्ति"
"श्री हरि को सृष्टि का भार एवं भोग-मोक्ष-दान का अधिकार दे भगवान शिव का अंतर्धान होना"
"उमा सहित भगवान शिव का प्रIकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूप का विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनो देवताओं की एकता का प्रतिपादन"
"ब्रह्मा और विष्णु को भगवान शिव के शब्दमय शरीर का दर्शन"
"भगवान विष्णु की नाभि से कमल का प्रादुर्भाव, शिवेच्छावश ब्रह्मा जी का उससे प्रकट होना, कमल नाल के उदगम का पता लगाने में असमर्थ ब्रह्मा का तप करना, श्री हरि का उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णु के बीच में अग्नि-स्तंभ का प्रकट होना तथा उसके और-छोर का पता ना पाकर उन दोनो का उसे प्रणाम करना"
"महाप्रलयकाल में केवल सदब्रह्म की सत्ता का प्रतिपादन, उस निर्गुण - निराकार ब्रह्म से ईश्वर मूर्ति (सदाशिव) का प्राकट्य, सदाशिव द्वारI स्वरूपभूतI शक्ति (अम्बिका) का प्रकटीकरण, उन दोनों के द्वारI उत्तम क्षेत्र (काशी या आनंदवन) का प्रादुर्भाव, शिव के वामांग से परम पुरुष (विष्णु) का अविर्भाव तथा उनके सकाश से प्राकृत तत्त्वों की क्रमश: उत्पत्ति का वर्णन"
"नारद जी का शिवतीर्थों में भ्रमण, शिव गणों को श्रापौद्धIर की बात बताना तथा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्मा जी से शिवतत्व के विषय में प्रश्न करना"
"नारद जी का भगवान विष्णु को क्रोधपूर्वक फटकारना और श्राप देना; फिर माया के दूर हो जाने पश्चाताप पूर्वक भगवान के चरणों में गिरना और शुद्धि का उपाय पूछना तथा भगवान विष्णु का उन्हें समझा बुझा कर शिव का महात्म्य जानने के लिए ब्रह्मा जी के पास जाने का आदेश और शिव के भजन का उपदेश देना"
"माया निर्मित नगर में शीलनिधि की कन्या पर मोहित हुए नारद जी का भगवान विष्णु से उनका रूप मांगना, भगवान का अपने रूप के साथ उन्हें वानर का सा मुंह देना, कन्या का भगवान को वरण करना और कुपित हुए नारद का शिवगणों को श्राप देना"
"ऋषियों के प्रश्न के उत्तर में नारद - ब्रह्म संवाद की अवतारणा करते हुए सूतजी का उन्हें नारद मोह का प्रसंग सुनाना; कामविजय के गर्व से युक्त हुए नारद का शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु के पास जाकर अपने तप का प्रभाव बताना"
"रुद्राक्ष धारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन"
"शिवनाम जप तथा भस्मधारण की महिमा, त्रिपुंड के देवता और स्थान आदि का प्रतिपादन"