¶ Intro / Opening
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¶ मन की चाल समझना और उस पर श्रद्धा
मन की चाल समझ ली, तो सब समझ लिया, मन को पहचान लिया, तो कुछ और पहचानने को बचता ने, मन की चाल के समझते ही, चेतना अपने में लीन हो जाती जब तक नहीं समझा है तभी तक मन का अनुसरन चलता है मन के पीछे चलता है आदमी यही मान के कि मन गुरू है, जो कहता है ठीक कहता है, जो बताता है ठीक बताता है, एक बार अपने मन पर संदेह आ जाए, तो जीवन में क्रांधी की सुरुवात हो जाती और मज़ा यही है कि मन सभी पर संदेह करता है और तुम कभी मन पर संदेह नहीं करते हैं मन पर तुम्हारी सरद्धा अपूर है
उसका कोई अंध ने और मन रोज तुम्हें गढ़े में डाले तो भी स्रद्धा नहीं तूटती मेरे पास लोग आते हैं वे कहते हैं लोगों की स्रद्धा उठ गई मैं उनसे कहता हूँ कि लोगों की जैसी स्रध्धा मन पर है उसे देख का ऐसा नहीं लगता कि लोगों की स्रध्धा उठ गई कितना ही भठका है मन कितना ही सताय मन, कितना ही भरमाय मन, स्रध्धा नहीं तूटती, स्रध्धा तो भरपूर है, गलत दिसा में है, आज तक मुझे कोई अस्रद्धालू आदमी नहीं मिला। स्रद्धा गलत दिसामा हो सकती। जिस पर नहीं होनी चाहिए उस पर हो सकती। लेकिन अस्रद्धालू कोई भी नहीं।
और दो ही सरद्धाएं या तो मन की सरद्धा है और या आत्मा की सरद्धा है या तो तुम अपने पर भरोसा करते हो अपने का अर्थ है जहां मन की कोई भनग भी नहीं जहां एक विचार भी नहीं तिरता जहां सुद्ध चेतना है या तो उस सुद्ध चेतना का तुम्हारा भरोसा है अगर उसका भरोसा है तो तुम जीवन में कहीं भी गड़े न पाओगे। तुम्हारा कोई पैर गलत न पड़ेगा। और या फिर आदमी बरुसा करता है मन पर, तब तुम गड़े ही गड़े पाओगे। तब तुम जीवन में जहां भी जाओगे भटकोगी क्योंकि मन की चाल ही ऐसी मन की चाल को समझ ले एक
कि मन तुम्हें देखने नहीं देता है। मन तुम्हें अंधा रखता है। मन तुम्हारी आँकों को धुंदला रखता है। धुएं से भरा रखता है। वो धुआ ही विचार है। इतनी तिवरता से मन विचारों को चलाता है कि तुम्हें जगे भी नहीं मिलती कि तुम देख पाओ कि तुम्हारे बाहर क्या हो रहा है कि तुम्हारे जीवन में क्या घट रहा है मन तुम्हें विचारों में उल्जाय रखता है जैसे छोटे बच्चे को हम खिलोने दे देते हैं फिर उसकी मा मर भी रही हो तो भी वो अपने खिलोनों से खेलता रहता है खिलोनों में उलजा रहता है
मन तुम्हें विचार देता है, विचार खिलोने, खिलोनों में भी थोड़ा बहुत सत्य है, विचारों में उतना भी नहीं, लेकिन एक खिलोनों से तुम चुक भी नहीं पाते हैं कि मन दत्चन दूसरा निर्मित कर देता है, इसके पहले कि तुम जाक के देख पाओ, मन तुम्हें नया खिलोना दे देता है। पुराने से तुम उप जाते हो, तो मन नई उल्जने सुझा देता है। एक उपद्रो बंद भी नहीं हो पाया कि मन दस उपद्रों में रस जगा देता है और ये इतनी तिवरता से होता है कि दोनों घटनाओं के बीच
¶ मन की भ्रामक तर्कशक्ति
खिर्की बनने लैग भी जगे नहीं मिलती जहां से तुम देख लो कि जिन्दकी में हो क्या रहा है। मैंने सुना हैं कि मुलना रस्तुर्दीन जब बहुत बुड़ा हो गया। नभ्य वर्स का हुआ है। तब उसका बड़ा भरा पूरा परिवार था। उसका बड़ा बेटा ही सत्र वर्स पार कर रहा था। उसके बेटों के बेटे पचास पार कर रहे थे उसके बेटों के बेटों के बेटे बिवाहत हो गए थे उनके भी बच्चे हो गए थे अचानक एक दिन बुढ़े नसरुद्दिन ने कहा कि मैंने फिर से साधी करने का तै कर लिया पत्नी मर चुकी थी पहले तो लड़कों ने मजाक समझी हसे
कि अब इस बढ़ा पे हम भी बुड़े हो गए अब साधी पिता जी मजाग कर रहे होंगे लेकिन नसुरुदीन ने जब बार बार दोर आया तो उन्होंने कम्भीरता से बात ली और जब नसुर्द दिन एक दिन सुभे आके घोशना ही कर दी कि मैंने लड़की भी तै कर ली तब जड़ा सोचना पड़ा सारा परिवारी खटा हुआ
उन्होंने विचार किया कि बड़ी फजियत होगी, लोग हसेंगे। ऐसे ही नसुरत दिन की वज़े से लोग जिंदगी भरासते रहे। और अभी बढ़ा पे ना आखरी उपतरों खड़ा कर। क्या कहेंगे लोग। बड़े लड़के को सबने कहा कि तुम्हीं जाके कहो। बड़े लड़के ने जो सुना तो और चकित हो गया। सुना की सामने ही एक रंग्रेश की लड़की से।
तै किया है नुसरुदीन ने लड़की की उम्र मुश्कल से 16 साल है उसने का ये नहीं हो सकता पापा ये बंद करो ये सोच ही छोड़ दो ये भी तो सोचो उस लड़की की उम्र सिर्फ सोला साल है नस्तु दिन्ना कारे पागल सोला साल ही तो साधी की उम्र है और पिर जब मैंने तरी मां से साधी की थी तब उसकी उम्र सोला ही साल थी
इसमें बुरा क्या हुआ जा रहा है मन तर्क दे रहा है मन पीछे लौट के नहीं देखता है मन अपनी तरफ नहीं देखता है मन सिर्फ दूसरे की तरफ देखता है लड़के बहुत परिशान हुए और बड़े बुढ़ों से सलाय ली डाक्टर से भी पूछा डाक्टर ने का ये बहुत खतनाक है इस उम्र में साधी
जीवन के लिए खत्रा हो सकती है। फिर बेटे को समझा बुजा के भेजा है। बेटे ने कहा कि हम सब सलहां बस मस्विरा किये। डाक्टर कहता है जीवन के लिए खत्रा हो सकता है। जीवन को दाओं पर मत लगाओ, नस्तु दिनने कारे पागल, अगर ये लड़की मर भी गए, तो कोई लड़कियों की कमी है, दूसरी लड़की खोज लेंगे.
मन कभी पीछे की तरफ देखता नहीं, अपनी तरफ नहीं देखता, मन जदा दूसरे को, दूसरे में खोजता है सुख, दूसरे पर थोपता है दुख, दूसरे से पाना चाहता है सांधी, दूसरे से ही पाता है आसांधी, सदा ही नजर दूसरे पे लगी है, जबकि नजर अपने पे लगी होनी चाहिए, तो मन के जगत का उपद रो, मूल आधार दूसरे पर द्रश्टी है दूसरे से क्या प्रियोजन है दूसरा मौलिक नहीं है मौलिक तो तुम हो लेकिन मन सदा भरमाता है अगर तुम दुखी हो तो मन कहता है जरूर कोई तुम्हें दूसरा दुखी कर रहा है तो तुम किसी ने किसी पर दुख थोप देते हो
जब तुम सुखी होते हो तब भी मन कहता है कोई दूसरे के कारण सुख मिल रहा है तब तुम सुख दूसरे पर थोप देते हो और मजा यह है कि दुख भी अपने कारण मिलता है सुख भी अपने कारण मिलता है नर्क भी भीतर है और स्वर्क भी भीतर अंतता तुम ही निरनायक हो क्योंकि तुम्हारी व्याक्या पर ही निर्भर करेगा कि क्या सुख है और क्या दुख है चाहो तो सुख दुख जैसा हो जाता है चाहो तो दुख सुख जैसा हो जाता है चनमें में बदल जाती है बात दूसरा निरनायक नहीं
लेकिन मन सदा दूसरे पर मन को अटकाय रखता है। और जन्मों जन्मों से तुम यही कर रहे हूँ। दूसरे पर थोप रहे हूँ। फिर तुम सुरोत को नहीं पाते है। पानी ही सकते है। क्योंकि जहां से सुख दुख उठते हैं वहां नजर ही नहीं जहां से सुख दुख उठते हैं अगर वहां नजर हो जाए तो तुम सुख भी जाए जो दुनिया भर में रहने वाले इंटरनाशनल लोगों को पैसे भेजने और इस्तिमाल करने में मदद करता है। आपको ना कभी कीमतों में अचानक बढ़ोतरी दिखेगी और ना ही कोई hidden charges. आपको सिर्फ fast और सुरक्ष्य ट्रांसफर की सुविधा मिलेगी.
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पती-पती को बदल रही है, पती-पत्नी को बदल रहा है, बाप-बेटे को बदल रहा है, बेटा भी कोशिस में लगा है कि बाप को बदल दे, मित्र-मित्र को बदल रहे हैं, सब एक दूसरे को बदलने में लगें, दूसरे को तुम कैसे बदल सकते हो? दूसरा स्वधंत्र है, उसकी अपनी नियती है, दूसरे का अपना आधार है, अपना केंद्र है, दूसरे का अपना स्रोत है जहां से उसके मनोभाव उठते हैं.
तुम दूसरे को नहीं बदल सकते हैं। तुम अगर किसी को बदल सकते हो तो स्वयम को। लेकिन वहां तो नजर ही नहीं। मन वहां देखने ही नहीं देता। जैसे ही कोई व्यक्ति स्वयम को देखता है वो पाता है सुख भी यही से उठते दुख भी यही से उठते न किवल यही जल्दी ही उसको दिखाई पड़ने लगता है कि हर सुख के साथ उसका दुख जुड़ा है
¶ सुख-दुख की अंतर्निहित एकता और मोक्ष
हर फूल के पास उसका काटा है और हर दिन के पीछी छिपी उसकी रात है जैसे जैसे तुम भीतर आते हो वैसे वैसे साफ होने लगता है कि अगर तुमने सुक चुना तो दुख भी चुन लिया हर सुक्का अपना दुप है हर स्वर्ग के पास उसका नर्ग है जराबी दूर नहीं संयूक थे एक ही द्वार है दोनों का जैसे ही तुमने सुक को चुना तच्छन तुमने दुख को चुन लिया जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू जिस दिन ये दिखाई पर जाता है पहला आनुभव कि सुख दुख भीतर से उठते हैं। दूसरा अनुभाव कि हर सुख और दुख सियुक थे। तब दुख और सुख में कोई भेद नहीं रह जाता।
और जो आदमी जान लेता है कि स्वर्ग और नर्ख में कोई भी भेद नहीं है वो दोनों को छोड़ देता है मन कोसिस करता है दुख को छोड़ने की और सुख को बचाने की ग्यानी दोनों को छोड़ देता है क्योंकि दोनों या तो साथ बचते हैं या साथ जाते हैं तुम सिक्के का एक पहलो बचाओगे कैसे बचा पाओगे दूसरा पहलो भी बच जाएगा
ज्यादा से ज्यादा एतनी कर सकते हो कि जो पहलो तुम्हें पसंद है उसे उपर कर लो जो पहलो तुम्हें पसंद है उसे नीचे कर दो लेकिन वहीं छिपा है हर दिये के तले अंधेरा है और हर सुक के नीचे छिपा दुख है देर अबेर वो जो नीचे छिपा है प्रगठोग है और जीवन का एक महतवपूर्ण नियन है
कि अगर तुमने सुक को उपर रखा और सुक को भोगा तो सुक चुक जाएगा और जब सुक चुक जाएगा तो दुख उठना सुरू हो जाएगा जिसको तुमने भोगा वो चुकेगा और जिसको नहीं भोगा वो बचा हुआ है उसको कौन भोगेगा एक पहलू तुमने खर्च कर लिया अब दूसरा पहलू बचा है अब उसे भी भोगना पड़ेगा ये दूसरी प्रतिती है भीतर जाते यात्री की कि सुख दुख संयोक थे तो इसका अर्थ हुआ कि सुख दुख है उन्हें जराबी भेदने ही बेद मन की ब्रांती थी मन की तेड़ी मेली चाल के कारण बेद मालूम पड़ता था सुख दुख दोनों छूट जाते छोड़ना भी नहीं पड़ता
ये एसास, ये प्रतिती, ये अनुभाव की दोनों एक है, फिर छोड़ना भी नहीं पड़ता, जैसे अंगारा हाथ में रखा हो, छोड़ना पड़ेगा, समझ में आया कि अंगारा है, कि छूट जाएगा जिससे घर में आग लगी हो तो निकलने के लिए कुछ प्रयास करना पड़ेगा पता चला कि आग लगी कि तुम बाहर हो जाओगे तुम फिर ये भी न पुछोगे कि कहां से बाहर जाओं। रिति रिवाज क्या है। सब भिमार्ग क्या होगा। तुम खिड़की से छलांग लगा के निकल जाओगी तुम यह न पूछोगी कि खिड़की से निकलना उचित अनुचित सिस्ट असिस्ट जब घर में आग लगी हो तो सिस्ट अचार को कोई पूछता है
तब तुम कहीं से भी छलंग लगा के निकल जाओगे। तुम बाहर हो जाओगे। घर में आग लगी है ये एसास भर हो जाए। जैसी कोई भीतर जाता है। वैसे ही सुख दुख एक ही हो जाते तत्चन छूट जाते जो सेस रह जाता है वही मोक्ष जो सेस रह जाता है वही तुम हो जो सेस रह जाता है वही परमात्मा है
¶ मन का द्वैत, माया और इंद्रधनुषी भ्रम
लेकिन मन तुम्हें भीतर नहीं जाने देता मन कहता है दूसरे ने दुख दिया मन कहता है दूसरे ने सुख दिया मन दूसरे पर अटकाय रखता है ये मन की पहली कुसलता है दूसरी कुसलता मन की कि वो हमेशा आधे को देखलाता है और आधे को नहीं देखने देता है जैसे कि चांद को हम देखते हैं, तो आधा चांद दिखाई पड़ता है, आधा नहीं दिखाई पड़ता है, उस तरफ का पहली उछे पर रहता है, मन जो भी देखता है, हमेशा आधे को देखता है,
मन पूरे को नहीं देख सकता है चान्तों बड़ी चीज है तुमारे हाथ में एक कंकड भी रखते हैं छोटा सा एक रेत का कंड रखते हैं उसको भी तुम पूरा नहीं देख सकते है आधी दिखेगा आधा उस तरफ जो है वो छिपा रहे मन आधे को ही देख सकता है मन आधे को देखने की बैवस्ता है इसलिए तो मन के कारण दोयत पैदा होता है क्योंकि आधे को देखता है उसे समझता है ये पूरा फिर दूसरे आधे को देखता है उसे समझता है ये पूरा और दोनों को कभी साथ तो देख नहीं सकता है इसलिए उनको एक कैसे माने इसलिए जहां एक है वहमन दो देखता है
और जब तुमने एक की जगे दो देख लिए संसार खड़ा हो जाता है। तुम देखते हो यह आदमी मित्र है और वो आदमी सत्रू है। लेकिन मित्र में सत्रू छिपाए, मित्र कभी भी सत्रू हो सकता है, और सत्रू में मित्र छिपाए, सत्रू कभी भी मित्र हो सकता है, कोई अर्चन नहीं है, कोई बाथा नहीं है, प्रेम में तुम्हारे ग्रणा छिपी है,
ग्रणा में प्रेम छेपा है लेकिन मन दो करके देखता है ग्रणा को अलग प्रेम को अलग सत्र को अलग मित्र को अलग सुख को अलग दुख को अलग और जब तुम एक को दो करके देख लेते हो फिर तुम जो भी करोगे वो गलत होगा बुनियास से गलती सुरू हो गई प्रारंब से ही भूल हो गई
मुल्ला नसुद्दीन एक रात सरापी के घर लौट रहा है सरापी को एक की जगे अनिक चीजें दिखाई बढ़ने लगती चीजें अनेक हो नहीं जाती अगर तुमने कभी सराब पी है या भंग के नसे में आ गये हो तो तुम्हें पता होगा कि एक चीजें दो दिखाई पढ़ने लग तीन तीन दिखाई पढ़ने लग तीन चार दिखाई पढ़ने जैस जैसे नसा बढ़ता है क्या होता है जिस जिस से नसा बढ़ता है बीतर तुम्हारी चेतना कपने लगती उसकी जो धिरता है खो जाती जो चेन है वो खो जाता है चेतना कपने लगती और जब चेतना कपने लगती
तो उसके कंपन के कारण एक चीजें बहुत होके दिखाई पड़ती जिससे चांड जील पर प्रितिबिम बना रहा है जील सांथ है अकंप तो एक चांड दिखाई पड़ता है जील में एक कंकर फेक दो जील में लहरें उट गई कमपन हो गया जील कब गई अब एक चांद हजार चांद में तूट गया अगर तुम जील को बहुत ही कपा दो तो चांद दिखाई ही न पड़ेगा बस चांद के टुकड़े ही टुकड़े पूरे जील पर फैल जाएंग चांद एक है जील कप कई, नसा तुम्हारी चेतना को कपा देता है।
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छेद और चाबी को मिला नहीं पाता हाथ कपरें एक पलिस वाला रास्ते पर खड़ा देख रहा है आखिर उसने का नसुर दीन क्या मैं साहता करूँ ताले में चाबी डाल दू नर्स अद्दीन ने का अगर साहता ही करना है तो जरा तुम मकान को समाले रखो तुमें चाबी डाल दू नसेल जी को ये नहीं दिखाई पड़ता कि मैं कपरा हूँ मकान कपरा है मकान को समाले रखो एक और दिन ऐसा ही नसा करके नसु दिन घर लोटता था एक ब्रक्ष से टक्कर हो गई
बड़ी मुश्किल में पड़ गया, ब्रक्ष तो एक था, उसको दो दिखाई पड़ रहे थे, तो वो दोनों के बीच से निकलने की, और कोई उपाई भी नहीं था, दोनों के बीच से निकलने की कोशिस कर रहा थे, जैसी कोशिस करता स्री ठकरा जाता, ब्रक्ष तो एक ही था, अनेक बार कोशिस की, तब वो जोर से चलाया हैं कि मारेगा, यह तो बड़ा जंगल है।
कोई एक ब्रक्ष नहीं है यहां जिसमें से निकल जाओ। बहुत ब्रक्ष है। बड़ी पुरा नहीं कता है। एक कुत्ता एक राज महल में प्रिवेस कर गया उस महल के राजा ने महल को सिर्फ दर्पणों से बनाया था दीवाल पर दर्पण ही दर्पण थे पूरा कांच का ही बना था कुत्ता मुसीबत में पड़ गया जहां देखा आने कुत्ते दिखाई पड़े घबड़ा गया यह तो कोई एकात कुत्ता नहीं है पूरे कुत्तों की सेना मालूम पर थी और भागने का उपाय नहीं दिखता चानों तरफ घेरे खड़े
और जैसा कुत्तों की आदत होती, कि पहलो उसने डरवाने की कोशिश की कि डर जाएं ये लोग, लेकिन जितना उसने कुत्तों को डरवाया, उतना ही कुत्तों न उसे डरवाया, क्योंकि वे उसी के प्रतिवेंबे थे। जैसे ही कुत्ता जप्टा और भोका, हजारों कुत्ते जप्टे और भोके, क्योंकि वे वहाँ थे ही नहीं, वे उसी की चायाएं थे, कुत्ता दरपणों से टकराया, जबट्टा मारा उसके प्रितिविम कुत्ते से टकराये सिर लहु लुहान हो गया सुबह कुत्ता मरा हुआ पाया गया वहाँ कोई भी ना था
जहां कुछ भी नहीं वहां भी तुम्हारे भीतर के कमपन जूठे अस्तित्व को निर्मित कर लेते उस जूठे अस्तित्व को ही हमने माया कहा है माया बाहर नहीं है तुम्हारे कपते हुए चित्ते के कारण जो है वो तो एक है लेकिन वो अनेकों के दिखाई पड़ रहा है
और तुम्हारी कोसिस वही है जो मुला नसर अदिन ने सिपाही से कही थी कि जरा तुम मकान को समाल लो तुम्हारी भी कोसिस यह है कि मकान को कैसे थिर कर लिया जाए कोई कभी नहीं कर पाया ग्यानियों ने मकान की फिकर छोड़ दी अपने को थिर कर लिया सब थिर हो जाता है जरूरत है कि नसा उतर जाए मकान तो थिर है वो कभी हिला ही न था
ये अस्तित्व कभी हिला ही नहीं है ये बिलकुल थे रहे है ये अपने में बिलकुल लीन है ये सभाव में डूबा है तुम हिल गए हो लेकिन तुम अस्तित्व को सम्हालने की कोशिस कर रहे हो मन द्वैत का सूत्र है और अनेक का भी सूत्र है मन से गुजर के चीजें वैसी ही हो जाती है जैसे सूरज की किरन को अगर तुम
एक कांच के तुकड़े से गुजरने दो कई पहलों का कांच का तुकड़ा ले लो प्रिज्म उस तुकड़े को कहा जाता है उसमें तरासी हुए कई पहलू सूरज की किरन गुजरती है उससे, जब आती है तो एक होती, जब उससे बाहन निकली तो साथ हो जाती, इसलिए तो इंदरधन उस निर्मित होता है। इंदर्धन उस निर्मित इसलिए हो जाता है कि हवा में वर्सा के दिनों में पानी के कंड लटके होते हैं वो पानी के कंड प्रिज्म का काम करते हैं उन पानी के कंडों में से सूरज की किरन गुजरती है
तूटके साथ हो जाती साथ रंग दिखाई पढ़ने लगते जगत तुम्हारे मन से गुजरा हुआ इंद्रधनों से किरन तो परमात्मा की एक है उसकी रोसनी एक है अस्तित्व का स्वभाव एक है अस्तित्व एक है लेकिन तुम्हारे मन की लटकी हुई बून से एक गुजर के साथ में तूट जाता है सब चीजें खंड-खंड हो जाती है
¶ मन का तार्किक जाल
और मन कहता है यही सकते और मन तुम्हें कभी लोट के नहीं देखना देता जहां से साथ पैदा हुए जहां एक से साथ का जन्म हुआ सारे ध्यान के प्रयोग मन से पीछे लोटने के प्रयोग हैं मन की तीसरी तेढ़ी चाल है कि मन बड़ा तरक निष्ट है वो हर चीज के लिए तरक देता है और तरक ऐसी सुगमता से देता है कि तुम्हें भी लगने लगता है कि ठीक ही तो बात है अस्तित्व तरक से बहुत बड़ा है और मन छोटे-छोटे तरक के आंगन बना लेता है साफ सुथरे है
सब ठीक ठीक मालूम पड़ता है लेकिन आंगन के पार जो अस्तित्व वो अतरक है वो तरक जैसा नहीं है वो गनित का कोई प्रियोग नहीं है वो गने से जादा कावे है कावे से भी जादा वो रहस्य की अनभूती है तो मन कहता है इस्वर हो ही नहीं सकता है कहां है दिखाओ क्योंकि जो भी है वो दिखाया जा सकता है और तुम तो कहते हो इस्वर ही इस्वर है वही सब जगे है तो दिखाओ मौजुद करो मन ने एक सवाल उठाया जिसका जवाब तुम न दे पाओगे क्योंकि इस्वर दिखाया नहीं जा सकता वो देखने वाला है वो बाहर द्रस्ट की तरह नहीं है तुम्हारे भीतर द्रस्टा की तरह है
और मन ने एक सवाल उठाया जो कि बड़ी अर्चन का है वो कहता दिखा दो न दिखा पाओगे तो मन हसेगा और कहेगा मूढ हो ना समझ हो अज्ञानी हो अंधविस्वासी हो जो दिखाया नहीं जा सकता उसको मानते हो मन कहता है हम तो अनुभाव को मानते और जब तक अनुभाव नहों जाये तब तक हम मानते ने मन ठीक ही कहता लगता है
तरक में कहीं भी भूल चूक नहीं है भूल चूक है तो इतनी बुनियादी है कि जब तक तुम मन से थोड़े सरकोगे ना तुम्हारी समझ में ना आएगी मन कहता है कि द्रस्ट की तरह परमात्मा को दिखा दो लेकिन परमात्मा का स्वभाव द्रस्ट की तरह नहीं है परमात्मा का स्वभाव द्रस्टा का है साक्षी का है
परमात्मा चैतन्य है वस्तु नहीं है। चैतना को देखा नहीं जा सकता है। चैतना में लीन हुआ जा सकता है। चैतना को गणिश से सिद्ध नहीं किया जा सकता है। चेतना को तो रहस की एक अनुभूती में अनुभव किया जा सकता है। चेतना को प्रयोक साला में पकड़ा नहीं जा सकता है। अगर पकड़ने की कोशिस की तो तुम खोदोगे। एक जिंदा आदमी को ले जाओ प्रयोग साला में, अंग-अंग काट डालो, हड़ी मिलेगी, मास मज्जा मिलेगी, चमड़ी मिलेगी, खून मिलेगा, एलमुनियम लोहा, सब दातुमें मिल जाएंगे बस एक चीज ना मिलेगी आत्मा लास मिलेगी जीवन ना मिलेगा
क्योंकि तुमने काटा उसी वक्त जीवन तरोहित हो जाता है। ऐसे ही जैसे एक फूल को कोई विसलेशन करे। तुम्हें मैं एक फूल दिखाऊं। कहूं कि देखो ये गुलाब का फूल कितना सुंदर है। और तुम कहो कहा है सुंदर ही। गुलाबी रंग दिखाई पड़ता है मान लेते पक्रियां हैं कॉमल हैं मान लेते गंध हैं मान लेते लेकिन सौंदरी कहा है संदरी दिखाओ, प्रयोक साला में सिद्ध करो, तो फूल को तम तोड डालो, जीवित पक्रियां मुर्जा जाएंगी, इम्रत हो जाएंगी.
जहां रस की धार बहती थी वहां रस की धार सूख जाएगी जहां से सुगंद उठती थी जल्दी ही सुगंद तिरोहित हो जाएगी फिर पक्रियों का तुम रासाइनिक विसलेशन कर लो तो पांसा चोटी चोटी बोतलों में लेबल लगा के तुम बता दोगे के इसमें इतनी मात्रा में फलापदार थे इतनी मात्रा में फलापदार थे लेकिन ऐसी तो एक भी बोतल नहोगी उन में जिसमें तुम कहो कि इतनी मात्रा में सुंदरिये मन तरकनिष्ट है, जीवन एक रहस है, जीवन कोई गणित नहीं, जीवन किसी दुकानदार का हिसाब नहीं, जीवन तो
किसी प्रेमी की आनुभूती है। जीवन तो किसी कवी का स्वर है। जीवन तो किसी संगीतग्य की लहर है। जीवन संदरी जैसा है। काव्य जैसा है प्रेम जैसा है जीवन परम रहस है और मन कहता है गनित तो मन की चाल बड़ी तेड़ी मेल
¶ तर्क की टेढ़ी चाल और जीवन की सरलता
इसको ख्याल में लेने फिर कबीर का ये पद एकदम साफ होने लगेगा चलत कत तेड़ो तेड़ो रे कबीर कहते हैं ए मन तेड़ा तेड़ा क्यों चलता है सीधा क्यों नहीं जाता है और मन बड़ा तेड़ा तेड़ा चलता है तुमने कभी सरावी को चलते देखा है सीधा नहीं चल सकता है तेड़ा तेड़ा चलता है एक पैर इस दिसा में दूसरा पैर दूसरी दिसा में
इसलिए तो अक्सर वो नाली में गिरा हुआ पाया जाता है तुम बीच सडक में सराबी को गिरा हुआ ना पाया जाता है तिरह तिरह चलता है तेढ़ेपन यह है कि जहां रहस है वहां तर्क उठाता है तर्क बड़ी तेढ़ी चीज है तर्क से ज्यादा तेढ़ा इस संसार में कुछ भी नहीं है
क्योंकि तर्क से तुम जो है उसे सिद्ध कर सकते हो कि नहीं है तर्क से जो नहीं है उसे तुम सिद्ध कर सकते हो कि वो है लेकिन ये हवाओं में बनाये गए घर ही, इनका अस्तित्य में कोई अर्थ नहीं, मुल्ला नस्रुद्दीन का बेटा इस स्कूल से पढ़ के लोटा, विस विध्याले से सिक्षित हुआ, सबसे बड़ी उपाधी लेके घर आया, तो जैसा कि अक्सर इन्वर्सिटी से लोटने वाले बच्चों को जल्दी होती दिखाने की कितना जान कर आए, कितना सीख कर आए, प्रभावित करने का मन होता है.
और इन्वर्सिटी से लोटने वाले सभी बच्चे माबाप को मूर समझते सांच को खाना खाने बैठे थे नसुदिन की पत्नी ने लाके दो अमरूद एक प्लेट में रखे बेटे ने कहा कि देखे विस विध्याले में कैसी अद्भुत बातें सिखाई जाती मैं तरक का इसनातक हूँ इसने अपनी माँ को कहा कि इसमें प्लेट में कितने अमरूद हैं। इमाने कहा दो हैं। बेटे ने कहा कि मैं सिद्ध कर सकता हूं तरक से की तीन। मा उस सुख हुई नसु दिन तो बैठा रा चुपचाप देखता रहा। मा उस सुख हुई उसने का सिद्ध करो। तो बेटे ने कहा कि देखो ये अमरूद एक, ये अमरूद दो।
दो और एक मिलके कितने होते हैं। मानना की बात तो ठीक है। दो और एक मिलके तीन होते हैं। मा सीधी भोली भाली थोड़ी मुश्कन में पड़ गई। बेटे ने नसुद्दीन की तरफ देखा, नसुद्दीन ने कहा कि बिल्कुल ठीक, एक हम ले लेंगे, दो तेरी माँ खाले कि तीसरा तू खाले
तरक हवा है उसे खाया नहीं जा सकता है ना तरक को जिया जा सकता है ना तरक को भोगा जा सकता है लेकिन तरक मन पर बड़ा भारी है और मन तरक से चल रहा है, इसलिए जीवन से तुम बंचित हो, जीवन सिधा सिधा है, उससे सरल और सुगम कुछ भी नहीं, तरक तेड़ा तेड़ा है, इसलिए कबीर कहते हैं, चलत कत, तेड़ो तेड़ो रहे,
सिधा क्यों नहीं चलता है साफ रास्ता है इधर उधर क्यों उतरता है यहां वहां की बहकी बहकी बातें क्यों करता है अपने मन को समझने की कोशिस करना जब तक तुम तर्क ही करते रहोगे तब तक समझना तुम तेड़े तेड़े जा रहे हो तब तक जो सीधे सीधे मिलता था उससे तुम बंचित रहोगे मंदिर के द्वार खुले
¶ मन की अशांति और सच्ची शांति
रह सिधी साफ है जराबी कोई बाधा नहीं है लेकिन मन तुम्हें यहां वहां उतार ले जाता है मन तुम्हें रह से उतार देता है मन तुम्हें बेराह कर देता और इतनी कुसलता से करता है, कि तुम्हें कभी ख्याल भी नहीं आ पाता है, एक मित्र मेरे पास आये, कुछ दिन पहले.
कहा कि मन बड़ा असान थे और सांती अब एकदम आवश्यक है नहीं तो मैं जीना सकूँगा आत्मगात तक का मन होता है धनी है, सबसुक्स विधा है, राजनीती के बड़े पदों पर रहे, मैंने उनसे पूछा, तो फिर प्रार्थना करो कहने लगे प्रार्थना में मन नहीं लगता है ध्यान करो कहने लगे ध्यान की बिल्कुल इच्छा नहीं होती मन असान थे लेकिन दियान में मन नहीं लगता है मन असान थे तो भी मन की ही सुने जा रहे हैं मन आत्मत्या के करीब ले आया है कहता हूँ प्रात्ना करो कहते हैं चाहनी उठती मन में जो आत्मत्या के करीब ले आया है
उस पर बरोसा नहीं छूटता मन असांत है स्रद्धा उसी पर है जिसने इतनी असांती दी मैं खता हूँ इसे छोड़ो इसकी मानना बंद करो वो कहते हैं कि मैं मन के उपर जाने के लिए आपके पास नहीं आया हूँ मैं तो सिर्फ मन की सांती चाहता हूँ अब यहीं बड़ा खेल है और यहीं मन के तरक उल्जा देते हैं मन कहता है मन की सांती चाहिए और मन की सांती कभी होती नहीं क्योंकि जब तक मन होता है तब तक सांती होती ही नहीं
मन ही तो असांती है, तो मन कभी सांत होने वाला है, तुमने कभी सुना कि किसी का मन सांत हो गया हो, ये तो ऐसे ही है जैसे कि तुम चिकिस्सित के पास जा के पहुँच, पूछो कि मेरी बीमारी को स्वस्थ होने का कोई उपाय बता दे। तुम स्वस्थ होगे, बीमारी स्वस्थ नहीं होगी। तुम सांत होगे, मन सांत नहीं होगा। और जब तक बीमारी है। तब तक तुम स्वस्थ कैसे होगे और तुम पूछ रहे होगी बीमारी को स्वस्थ करने की कोई ओसद ही दे दे सागर में तूफान उठता है पहाडों की तरह लहरे उठती है
उस छण में सागर असांध तुफान क्या तुम पूस्ते हो कि जब सागर सांध हो जायेगा तब क्या होगा तुफान रहेगा सांध होकर रहेगा तुफान नहीं रहेगा
